दर्द-ए-दिल रोएँ किस उम्मीद पे बेगाने से

सुब्ह होने की नहीं यास इस अफ़्साने से

कोई इतना भी नहीं आप से ग़ीबत ही करे
काँटे पड़ते हैं ज़बाँ में मिरे अफ़्साने से

दस्त-ए-गुस्ताख़ से मुमकिन नहीं आराइश-ए-हुस्न
गेसू-ए-यार सँवरने के नहीं शाने से

दामन-ए-बाद-ए-बिहारी है गरेबाँ पे निसार
आती है बू-ए-मोहब्बत तिरे दीवाने से

फिर वही कूचा वही दर वही सौदा वही सर
खींच लाया है ये दिल फिर मुझे वीराने से

आज ही छूटे जो कल छुटता हो ये दैर-ए-ख़राब
वहशत-आबाद-ए-जहाँ कम नहीं वीराने से

हवस-ए-आलम-ए-बाला ने किया है दिल तंग
रूह घबरा गई अब जिस्म के काशाने से

अपनी परछाईं से दीवानों को नफ़रत ही रही
जीते-जी निकले न ज़िंदाँ के सियह-ख़ाने से

हुस्न-ए-मा'नी के जो शैदा हैं उधर क्या देखें
सूरत-ए-आबाद जहाँ कम नहीं वीराने से

जान-ए-मन मा'रिफ़त उस हुस्न की आसान नहीं
दाद क्या चाहते हो तुम किसी बेगाने से

कैफ़िय्यत से कभी ख़ाली नहीं दिल मस्तों का
हू-ब-हू मिलता है साक़ी तिरे पैमाने से

साक़िया दिल की हवस मिट न सकी पीरी में
प्यास बुझती नहीं टूटे हुए पैमाने से

आग में कूद पड़ा दिल की लगी वो शय है
आतिश-ए-शौक़ को पूछे कोई परवाने से

और पर्दे की मुलाक़ात करेगी अंधेर
शम्अ''' क्यूँ छुपती है फ़ानूस में परवाने से

नासेहा है कोई ऐसा कि सँभाले मुझ को
लड़ गई आँख मिरी फिर किसी मस्ताने से

दूर से देखने के 'यास' गुनहगार हैं बस
आश्ना तक न हुए लब कभी पैमाने से

जाम लबरेज़ हुआ है किसी महजूर का आज
बू-ए-ख़ूँ आती है साक़ी तिरे पैमाने से

पहले सरगोशियाँ थीं छा गया अब सन्नाटा
बज़्म में सुब्ह हुई 'यास' के अफ़्साने से

मसनद-ए-आतिश-ए-मग़्फ़ूर मुबारक हो 'यास'
आए सन्नाटे में 'ग़ालिब' तिरे अफ़्साने से

— Yagana Changezi

More by Yagana Changezi

Other ghazal from the same pen

See all from Yagana Changezi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling