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Urooj Zaidi Badayuni

Top 10 of Urooj Zaidi Badayuni

Urooj Zaidi Badayuni

Top 10 of Urooj Zaidi Badayuni

    एहतिमाम-ए-रंग-ओ-बू से गुलिस्ताँ पैदा करें
    आओ मिल-जुल कर बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ पैदा करें

    क्यूँ सुकूत-ए-बे-महल से दास्ताँ पैदा करें
    दीदा-ओ-दानिस्ता अपने राज़दाँ पैदा करें

    रास आ सकता है मीर-ए-कारवाँ बनने का ख़्वाब
    शर्त ये है पहले अपना कारवाँ पैदा करें

    कार-आराई तो ख़ुद है हासिल-ए-तकमील-ए-कार
    दिल में क्या अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ पैदा करें

    अपना एजाज़-ए-तसव्वुर देखने की चीज़ है
    हम जो चाहें तो मकाँ में ला-मकाँ पैदा करें

    वक़्त को ज़िद ही बदल दो रस्म-ए-अर्ज़-ए-मुद्दआ'
    दिल ये कहता है कि हंगामा कहाँ पैदा करें

    आप की मर्ज़ी का है पाबंद-ए-रंग-ए-गुलिस्ताँ
    आप चाहें तो बहार-ए-जावेदाँ पैदा करें

    रूह पर हावी न हो जाए फ़ज़ा-ए-सोगवार
    हम ग़म-ए-दिल से निशात-ए-जावेदाँ पैदा करें

    कोशिश-ए-तामीर की तख़रीब-सामानी न पूछ
    आशियाँ-बरदार शाख़ें बिजलियाँ पैदा करें

    हाँ सिखा दें रंग-ए-रुख़ को आइना-दारी का फ़न
    बहर-ए-अर्ज़-ए-मुद्दआ' हम तर्जुमाँ पैदा करें

    फिर बुलाता तूँ के ये तेवर कहाँ बाक़ी 'उरूज'
    हाल-ए-दिल कह कर जवाब-ए-दरमियाँ पैदा करें
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    अश्क पर गुदाज़-दिल हाशिया चढ़ाता है
    इक ज़रा से क़िस्से को दास्ताँ बनाता है

    हाँ वो काफ़िर-ए-नेमत कोर-ज़ौक़ है यारो
    जो ग़म-ए-मोहब्बत को हादिसा बताता है

    जीते-जी का रिश्ता है रूह-ओ-जिस्म का रिश्ता
    धूप के तआ'क़ुब में साया मात खाता है

    जब ज़बान-बंदी हो नज़रें काम करती हैं
    इक पयाम आता है इक पयाम जाता है

    पत्थरों के सीने में आइने भी हीरे भी
    ज़ुल्मतों का ख़ालिक़ ही मेहर-ओ-मह उगाता है

    क्यूँ जवार-ए-मंज़िल में सुस्त-गाम हैं राही
    क़ुर्ब का यक़ीं शायद फ़ासला बढ़ाता है

    ऐ 'उरूज' ये दुनिया क़द्र-ए-दर्द क्या जाने
    क्यूँ ज़माना-साज़ों को हाल-ए-दिल सुनाता है
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    रफ़्ता रफ़्ता दिल-ए-बे-ताब ठहर जाएगा
    रफ़्ता रफ़्ता तिरी नज़रों का असर जाएगा

    दाद बे-दाद की इस में कोई तख़सीस नहीं
    नक़्श-ए-हस्ती में कोई रंग तो भर जाएगा

    आप अगर माइल-ए-तज्दीद-ए-सितम हो जाएँ
    रंग-ए-तालीम-ए-वफ़ा और निखर जाएगा

    अर्ज़-ए-तिश्ना पे बरस अब्र-ए-रवाँ खुल के बरस
    बात रह जाएगी ये वक़्त गुज़र जाएगा

    धूप और छाँव मुसल्लम मगर अपनी हद में
    वक़्त पाबंद नहीं है कि ठहर जाएगा

    रौशनी में है चराग़ों के तले तारीकी
    हम समझते थे कि माहौल सँवर जाएगा
    इश्क़ तो अपनी जगह कैफ़-ए-मुसलसल है 'उरूज'
    नश्शा-ए-बादा नहीं है जो उतर जाएगा
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    इश्क़ के हाथों में परचम के सिवा कुछ भी नहीं
    उस का आलम तेरे आलम के सिवा कुछ भी नहीं

    बे-यक़ीनी सू-ए-ज़न ईमान-ए-नाक़िस की दलील
    फ़िक्र-ए-राहत खतरा-ए-ग़म के सिवा कुछ भी नहीं

    हम से पूछो हम बताएँ ग़ायत-ए-कौन-ओ-मकाँ
    कारगाह-ए-इब्न-ए-आदम के सिवा कुछ भी नहीं

    आतिश-ए-नफ़रत से अब दुनिया है ऐसे मोड़ पर
    दीदा-वर गो ये जहन्नम के सिवा कुछ भी नहीं

    याद-ए-अय्या
    में कि ये भी जान-ए-रज़्म-ओ-बज़्म थे
    जिन के पास अब चश्म-ए-पुर-नम के सिवा कुछ भी नहीं

    हम नहीं मिनजुमला अहल-ए-रज़ा क्यूँ कर कहें
    जिन के लब पर क़िस्सा-ए-ग़म के सिवा कुछ भी नहीं

    अहल-ए-दुनिया के लिए जो अब्र-ए-नैसाँ था 'उरूज'
    अब वो इंसाँ अश्क-ए-शबनम के सिवा कुछ भी नहीं
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    हर क़दम पर मुझे लग़्ज़िश का गुमाँ होता है
    चश्म-ए-साक़ी की नवाज़िश का गुमाँ होता है

    ये हिजाबात-ए-तअय्युन मुझे मंज़ूर नहीं
    फ़िक्र-ए-आज़ाद को बंदिश का गुमाँ होता है

    लुत्फ़-ए-पैहम न सही जौर-ए-मुसलसल ही सही
    हर तवज्जोह पे नवाज़िश का गुमाँ होता है

    उन के आगे लब-ए-इज़हार पे है मोहर-ए-सुकूत
    एक ख़ामोश परस्तिश का गुमाँ होता है

    मैं क़फ़स में हूँ क़फ़स पेश-ए-निगाह-ए-सय्याद
    पर-ए-पर्वाज़ में जुम्बिश का गुमाँ होता है

    सिर्फ़ तुम दिल की तबाही का सबब क्या होते
    बख़्त-ए-ना-साज़ की साज़िश का गुमाँ होता है

    बात ये क्या है 'उरूज' इन की हर इक बात में आज
    अपनी हर तर्ज़-ए-गुज़ारिश का गुमाँ होता है
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    दिल ने ठोकर खा के समझा हादसा क्या चीज़ है
    ग़म किसे कहते हैं दर्द-ए-ला-दवा क्या चीज़ है

    महव-ए-हैरत हूँ ये दुनिया से जुदा क्या चीज़ है
    आप का पैग़ाम बे-हर्फ़-ओ-सदा क्या चीज़ है

    इस के मा'नी ख़ुद-पसंदी के सिवा कुछ भी नहीं
    दिल में पैहम ख़्वाहिश-ए-दाद-ए-वफ़ा क्या चीज़ है

    अब अँधेरा ही अँधेरा है उफ़ुक़-ता-ब-उफ़ुक़
    इस हक़ीक़त में ख़िलाफ़-ए-माजरा क्या चीज़ है

    कुफ़्र है ये सोचना भी कारोबार-ए-इश्क़ में
    मुद्दआ' क्या शय है तर्क-ए-मुद्दआ क्या चीज़ है

    सर है ज़ेब-ए-दार लेकिन लब तबस्सुम-आश्ना
    हक़-नवाई पर मैं ख़ुश हूँ ये सज़ा क्या चीज़ है

    कार-आराई-ए-सई-ए-शौक़ है पेश-ए-नज़र
    वर्ना सोचो जुम्बिश-ए-पर्दा-कुशा क्या चीज़ है

    हम रज़ा-ए-दोस्त में राज़ी हैं ये सच है तो फिर
    देखना होगा कि दस्तूर-ए-दुआ क्या चीज़ है

    रफ़्ता रफ़्ता तुम पे सब कुछ आइना हो जाएगा
    क्या बताऊँ सई-ए-तर्क-ए-मुद्दआ' क्या चीज़ है

    जल्वा-गाह-ए-नाज़ से उठना कोई आसाँ नहीं
    पहले ये देखो यहाँ ज़ंजीर-ए-पा क्या चीज़ है

    जिन की फ़ितरत ना-शनास-ए-ज़ौक़-ए-मोहकम है 'उरूज'
    मैं उन्हें ये कैसे समझाऊँ वफ़ा क्या चीज़ है
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    चाँद-तारों का तिरे रू-ब-रू सज्दा करना
    ख़्वाब देखा है तो क्या ख़्वाब का चर्चा करना

    हुस्न-ए-बरहम से मिरा अर्ज़-ए-तमन्ना करना
    जैसे तूफ़ान में साहिल से किनारा करना

    रास आएगा न ये कोशिश-ए-बेजा करना
    बद-गुमानी को बढ़ा कर मुझे तन्हा करना

    मेरी जानिब से है ख़ामोश दरीचे का सवाल
    कब से सीखा तिरी आवाज़ ने पर्वा करना

    हर-क़दम पर मिरी काँटों ने पज़ीराई की
    जुर्म पूछो तो बहारों की तमन्ना करना

    दावत-ए-शोख़ी-ए-तक़दीर उसे कहते हैं
    कार-ए-इम्रोज़ न करना ग़म-ए-फ़र्दा करना

    उन की मोहतात-निगाही ने भरम खोल दिया
    जिन को मंज़ूर न था राज़ का इफ़्शा करना

    वक़्त के हाथों में तिरयाक भी है ज़हर भी है
    उस को यक-रंग समझ कर न भरोसा करना

    तर्जुमान-ए-ग़म-ए-दिल उन की नज़र होती है
    जिन को आता नहीं इज़्हार-ए-तमन्ना करना

    ख़ुद-नुमाई नहीं इंसान की ख़ुद्दारी है
    परचम-ए-अज़्मत-ए-किरदार को ऊँचा करना

    ज़ुल्मत-ए-जुम्बिश-ए-लब की नहीं उम्मीद मगर
    निगह-ए-नाज़ न भूलेगी इशारा करना

    गो मैं यूसुफ़ नहीं दामन तो मिरे पास भी है
    तुम ज़रा पैरवी-ए-दस्त-ए-ज़ुलेख़ा करना

    ऐ कि तू नाज़िश-ए-सन्नाई-ए-दस्त-ए-फ़ितरत
    काश आता न तुझे ख़ून-ए-तमन्ना करना

    जादा-ए-इश्क़ में इक ऐसा मक़ाम आता है
    शर्त-ए-अव्वल है जहाँ तर्क-ए-तमन्ना करना

    आप के अहद-ए-वफ़ा पर मिरा ईमाँ जैसे
    किसी गिरती हुई दीवार पे तकिया करना

    कोशिश-ए-ज़ब्त में हर साँस क़यामत है 'उरूज'
    खेल समझे हो ग़म-ए-दिल को गवारा करना
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    तल्ख़ी-ए-ग़म मिरे एहसास का सरमाया है
    हुस्न से मैं ने ये इनआम-ए-वफ़ा पाया है

    जब कभी इशरत-ए-रफ़्ता का ख़याल आया है
    मैं नय पहरों दिल-ए-बे-ताब को समझाया है

    हाए ये बे-ख़ुदी इश्क़ को मा'लूम नहीं
    कौन आया है कब आया है कहाँ आया है

    दिल को सीमाब सिफ़त कह के गुज़रने वाले
    ख़ुद पे तड़पा है कि तू ने उसे तड़पाया है

    काफ़िर-ए-इश्क़ न समझूँ तो उसे क्या समझूँ
    मेरे इख़्लास को इक दोस्त ने ठुकराया है

    अपनी इस हार को मैं जीत न क्यूँ कर समझूँ
    ख़ुद को खोया है तो ऐ दोस्त तुझे पाया है

    तुम मिरे हाल-ए-परेशाँ पे न तन्क़ीद करो
    तुम ने दामन कभी काँटों में भी उलझाया है

    मंज़िल-ए-दिल भी वही कू-ए-मलामत भी वही इश्क़ का जज़्बा-ए-बे-ताब कहाँ लाया है

    आँख झपकेगी तो शीराज़ा बिखर जाएगा
    किस की आवाज़ थी जिस ने मुझे चौंकाया है

    जिस को कहते हैं ग़ज़ल उस की बदौलत ही 'उरूज'
    रुख़-ए-उर्दू पे ये रंग और निखार आया है
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    मुझ को मजबूर-ए-सर-कशी कहिए
    आप अँधेरे को रौशनी कहिए

    उन से बिछड़ा तो इस अज़ाब में हूँ
    मौत कहिए कि ज़िंदगी कहिए

    सर-ए-साहिल भी लोग प्यासे हैं
    इस को आशोब-ए-तिश्नगी कहिए

    क्यूँ तजाहुल को आरिफ़ाना कहूँ
    मेरे चेहरे को अजनबी कहिए

    चार दिन की है चाँदनी लेकिन
    चाँदनी है तो चाँदनी कहिए

    मौत भी ज़िंदगी का इक रुख़ है
    इस को मेआ'र-ए-आगही कहिए

    ग़म से हम बे-मज़ा नहीं होते
    लज़्ज़त-ए-ग़म को चाशनी कहिए

    मुझ को बख़्शी है फ़िक्र-ए-अर्ज़-ओ-समा
    दोस्त की बंदा-परवरी कहिए

    जलता-बुझता ये किर्मक-ए-शब-ताब
    उस को पुर-कार-ए-सादगी कहिए

    मुझ को मुड़ मुड़ के देखने वाले
    क्या इसे तर्ज़-ए-बे-रुख़ी कहिए

    धूप में साथ साथ साया है
    रौशनी में भी तीरगी कहिए

    रहबरी भी है हम-रकाब-ए-उरूज
    उस को फ़ैज़ान-ए-ख़ुद-रवी कहिए
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    Urooj Zaidi Badayuni
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    ख़्वाब का अक्स कहाँ ख़्वाब की ता'बीर में है
    मुझ को मा'लूम है जो कुछ मिरी तक़दीर में है

    मेरी रूदाद-ए-मोहब्बत को न सुनने वाले
    तुझ में वो बात कहाँ जो तिरी तस्वीर में है

    पैकर-ए-ख़ाक भी हूँ बाइ'स-ए-कौनैन भी हूँ
    कितना ईजाज़ नुमायाँ मिरी तफ़्सीर में है

    फूल बन कर भी ये एहसास शगूफ़े को नहीं
    मेरी तख़रीब का पहलू मिरी ता'मीर में है

    हुस्न के साथ तुझे हुस्न-ए-वफ़ा भी मिलता
    इसी हल्क़े की ज़रूरत तिरी ज़ंजीर में है

    वुसअ'त-ए-दामन-ए-रहमत की क़सम खाता हूँ
    उज़्र-ए-तक़्सीर भी दाख़िल-ए-हद-ए-तक़्सीर में है

    एक तहदार ये मिस्रा है जवाब-ए-ख़त में
    किस क़दर शोख़-बयानी तिरी तहरीर में है

    क्या तमाशा है ये ऐ पा-ए-जुनून-ए-रुस्वा
    कभी ज़ंजीर से बाहर कभी ज़ंजीर में है

    जाने कब उस पे उजाले को तरस आएगा
    वो सियह-पोश फ़ज़ा जो मिरी तक़दीर में है

    गुफ़्तुगू होती है अक्सर शब-ए-तन्हाई में
    एक ख़ामोश तकल्लुम तिरी तस्वीर में है

    मेरी नज़रों में यही हुस्न-ए-तग़ज़्ज़ुल है 'उरूज'
    शेर-गोई का मज़ा पैरवी-ए-'मीर' में है
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    Urooj Zaidi Badayuni
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Kushal DauneriaKushal DauneriaVarun AnandVarun AnandBalmohan PandeyBalmohan PandeyAnand Narayan MullaAnand Narayan MullaVipul KumarVipul KumarShahzad AhmadShahzad AhmadFarhat Abbas ShahFarhat Abbas ShahYasir KhanYasir KhanKhumar BarabankviKhumar BarabankviObaidullah AleemObaidullah Aleem