10
0 Likes
9
0 Likes
8
0 Likes
7
0 Likes
6
0 Likes
ख़ामोशी की रम्ज़ सुझा
बोल रहा है बोलता जा
बोल रहा है बोलता जा
टेक लगा हम ऐसों से
दीवारों का मान बढ़ा
ख़ाक हुए दरबारों की
यकताई का गीत सुना
चीख़ सुनी दरवाज़ों की
जैसे कहते हों मत जा
हब्स की ख़ातिर कमरे में
ज़िंदानी का इस्म पढ़ा
हाथ कटे इस बस्ती में
कुर्ता लीर-ओ-लीर हुआ
रोना है तो खुल कर रो
रोने वाली शक्ल बना
इश्क़ हुआ बीमारी से
आसेबों का रिज़्क़ खुला
5
0 Likes
4
0 Likes
डरा रही थी मुझे और डर लिया मैं ने
फिर एक रोज़ मोहब्बत का सर लिया मैं ने
फिर एक रोज़ मोहब्बत का सर लिया मैं ने
किसी से माँगी मुसलसल रसद अज़िय्यत की
फिर अपने साए को दीवार कर लिया मैं ने
पहन रहे थे किसी ग़म का पैरहन कुछ लोग
अगरचे महँगा पड़ा मुझ को पर लिया मैं ने
बग़ैर उदासी मुनासिब नहीं था घर जाना
ये इंतिज़ाम उसे छू के कर लिया मैं ने
तमाम हो गई मुझ पर किसी की हुज्जत दोस्त
जहाँ नहीं था बिफरना बिफर लिया मैं ने
3
0 Likes
2
0 Likes
पाँव का ध्यान तो है राह का डर कोई नहीं
मुझ को लगता है मिरा ज़ाद-ए-सफ़र कोई नहीं
मुझ को लगता है मिरा ज़ाद-ए-सफ़र कोई नहीं
बाज़ औक़ात तो मैं ख़ुद पे बहुत चीख़ता हूँ
चीख़ता हूँ कि उधर जाओ जिधर कोई नहीं
सर पे दीवार का साया भी उदासी है मुझे
ज़ाहिरन ऐसी उदासी का असर कोई नहीं
आख़िरी बार मुझे खींच के सीने से लगा
और फिर देख मुझे मौत का डर कोई नहीं
ख़ुद-कुशी करते समय पूछता हूँ मेरा अज़ीज़
और आवाज़ सी आती है तो मिरा कोई नहीं
भरी दुनिया है सिसकने में झिजक होगी तुम्हें
ये मिरा दिल है इधर रो लो इधर कोई नहीं
एक दिन लोग मुझे तख़्त-नशीं देखेंगे
या ये देखेंगे मिरा जिस्म है सर कोई नहीं
उस की हिजरत बड़ा आ'साब-शिकन सानेहा थी
शहर तो शहर है जंगल में शजर कोई नहीं
सुब्ह से रात की मायूसी भगाने का सबब
कोई तो होता मिरे दोस्त मगर कोई नहीं
बे-ख़याली सी मुझे गोद में भर लेती है
दर पे दस्तक हो तो कह देता हूँ घर कोई नहीं
1
0 Likes









