तिरी सुरमई आँख से बहने वाला सियह अश्क
जिस ने मलाल ओढ़ कर तेरी तकमील की
मैं ने जो भी किया
अपने अंदर का वहशी जगा कर तिरे सामने सर-ब-ज़ानू किया
या उदासी के जबड़े से छीनी हुई रंज की इस ग़ज़बनाक ख़ुराक से तेरा दोज़ख़ भरा
तेरी तकमील की
अब मुझे भी अज़िय्यत की बाबत में कोई सितारा बदन चाहिए
अपने अंदर के शोर-ओ-शग़ब से निकल कर मिरी बात सुन
शाख़-ए-उम्मीद पर कोई काँटा खिला
मुझ को वापस बुला
— Osama Khalid















