दिल-ए-बे-मुद्दआ है और मैं हूँ
मगर लब पर दुआ है और मैं हूँ
न साक़ी है न अब वो शय है बाक़ी
मिरा दौर आ गया है और मैं हूँ
उधर दुनिया है और दुनिया के बंदे
इधर मेरा ख़ुदा है और मैं हूँ
कोई पुरसाँ नहीं पीर-ए-मुग़ाँ का
फ़क़त मेरी वफ़ा है और मैं हूँ
अभी मीआद बाक़ी है सितम की
मोहब्बत की सज़ा है और मैं हूँ
न पूछो हाल मेरा कुछ न पूछो
कि तस्लीम ओ रज़ा है और मैं हूँ
ये तूल-ए-उम्र ना-माक़ूल ओ बे-कैफ़
बुज़ुर्गों की दुआ है और मैं हूँ
लहू के घूँट पीना और जीना
मुसलसल इक मज़ा है और मैं हूँ
'हफ़ीज़' ऐसी फ़लाकत के दिनों में
फ़क़त शुक्र-ए-ख़ुदा है और मैं हूँ
दिल से तिरा ख़याल न जाए तो क्या करूँ
मैं क्या करूँ कोई न बताए तो क्या करूँ
उम्मीद-ए-दिल-नशीं सही दुनिया हसीं सही
तेरे बग़ैर कुछ भी न भाए तो क्या करूँ
दिल को ख़ुदा की याद तले भी दबा चुका
कम-बख़्त फिर भी चैन न पाए तो क्या करूँ
दिन हो कि रात एक मुलाक़ात की है बात
इतनी सी बात भी न बन आए तो क्या करूँ
जो कुछ बना दिया है तिरे इंतिज़ार ने!
अब सोचता हूँ तू इधर आए तो क्या करूँ
दीदा-वरान-ए-बुत-कदा इक मशवरा तो दो
काबा झलक यहाँ भी दिखाए तो क्या करूँ
अपनी नफ़ी तो फ़लसफ़ी-जी क़त्ल-ए-नफ़्स है
कहिए कोई ये जुर्म सुझाए तो क्या करूँ
ये हाए हाए मज़्हका-अंगेज़ है तो हो
दिल से उठे ज़बान जलाए तो क्या करूँ
मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ गर्दान बन गई
मैं क्या करूँ कोई न बताए तो क्या करूँ
अख़बार से मिरी ख़बर-ए-मर्ग ऐ 'हफ़ीज़'
मेरा ही दोस्त पढ़ के सुनाए तो क्या करूँ
दिल अभी तक जवान है प्यारे
किस मुसीबत में जान है प्यारे
तू मिरे हाल का ख़याल न कर
इस में भी एक शान है प्यारे
तल्ख़ कर दी है ज़िंदगी जिस ने
कितनी मीठी ज़बान है प्यारे
वक़्त कम है न छेड़ हिज्र की बात
ये बड़ी दास्तान है प्यारे
जाने क्या कह दिया था रोज़-ए-अज़ल
आज तक इम्तिहान है प्यारे
हम हैं बंदे मगर तिरे बंदे
ये हमारी भी शान है प्यारे
नाम है इस का नासेह-ए-मुश्फ़िक़
ये मिरा मेहरबान है प्यारे
कब किया मैं ने इश्क़ का दावा
तेरा अपना गुमान है प्यारे
मैं तुझे बेवफ़ा नहीं कहता
दुश्मनों का बयान है प्यारे
सारी दुनिया को है ग़लत-फ़हमी
मुझ पे तो मेहरबान है प्यारे
तेरे कूचे में है सुकूँ वर्ना
हर ज़मीं आसमान है प्यारे
ख़ैर फ़रियाद बे-असर ही सही
ज़िंदगी का निशान है प्यारे
शर्म है एहतिराज़ है क्या है
पर्दा सा दरमियान है प्यारे
अर्ज़-ए-मतलब समझ के हो न ख़फ़ा
ये तो इक दास्तान है प्यारे
जंग छिड़ जाए हम अगर कह दें
ये हमारी ज़बान है प्यारे
आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए
आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए
ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं
मौत ही आती है ये मंज़िल दिखाने के लिए
मेरी पेशानी पे इक सज्दा तो है लिक्खा हुआ
ये नहीं मालूम है किस आस्ताने के लिए
उन का वअदा और मुझे उस पर यक़ीं ऐ हम-नशीं
इक बहाना है तड़पने तिलमिलाने के लिए
जब से पहरा ज़ब्त का है आँसुओं की फ़स्ल पर
हो गईं मुहताज आँखें दाने दाने के लिए
आख़िरी उम्मीद वक़्त-ए-नज़अ उन की दीद थी
मौत को भी मिल गया फ़िक़रा न आने के लिए
अल्लाह अल्लाह दोस्त को मेरी तबाही पर ये नाज़
सू-ए-दुश्मन देखता है दाद पाने के लिए
नेमत-ए-ग़म मेरा हिस्सा मुझ को दे दे ऐ ख़ुदा
जम'अ रख मेरी ख़ुशी सारे ज़माने के लिए
नुस्ख़ा-ए-हस्ती में इबरत के सिवा क्या था 'हफ़ीज़'
सुर्ख़ियाँ कुछ मिल गईं अपने फ़साने के लिए
दिल अभी तक जवान है प्यारे
किस मुसीबत में जान है प्यारे
तू मिरे हाल का ख़याल न कर
इस में भी एक शान है प्यारे
तल्ख़ कर दी है ज़िंदगी जिस ने
कितनी मीठी ज़बान है प्यारे
वक़्त कम है न छेड़ हिज्र की बात
ये बड़ी दास्तान है प्यारे
जाने क्या कह दिया था रोज़-ए-अज़ल
आज तक इम्तिहान है प्यारे
हम हैं बंदे मगर तिरे बंदे
ये हमारी भी शान है प्यारे
नाम है इस का नासेह-ए-मुश्फ़िक़
ये मिरा मेहरबान है प्यारे
कब किया मैं ने इश्क़ का दावा
तेरा अपना गुमान है प्यारे
मैं तुझे बेवफ़ा नहीं कहता
दुश्मनों का बयान है प्यारे
सारी दुनिया को है ग़लत-फ़हमी
मुझ पे तो मेहरबान है प्यारे
तेरे कूचे में है सुकूँ वर्ना
हर ज़मीं आसमान है प्यारे
ख़ैर फ़रियाद बे-असर ही सही
ज़िंदगी का निशान है प्यारे
शर्म है एहतिराज़ है क्या है
पर्दा सा दरमियान है प्यारे
अर्ज़-ए-मतलब समझ के हो न ख़फ़ा
ये तो इक दास्तान है प्यारे
जंग छिड़ जाए हम अगर कह दें
ये हमारी ज़बान है प्यारे
हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके
तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके
तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन
किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके
होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम
बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके
रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं
दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके
शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ
किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके
ऐसा हो कोई नामा-बर बात पे कान धर सके
सुन के यक़ीन कर सके जा के उन्हें सुना सके
इज्ज़ से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज-ए-दोस्त
अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके
अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल
कौन तिरी तरह 'हफ़ीज़' दर्द के गीत गा सके
रंग बदला यार ने वो प्यार की बातें गईं
वो मुलाक़ातें गईं वो चाँदनी रातें गईं
ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल की बात बताता जा
अब मैं दिल को क्या समझाऊँ मुझ को भी समझाता जा
इरादे बाँधता हूँ सोचता हूँ तोड़ देता हूँ
कहीं ऐसा न हो जाए कहीं ऐसा न हो जाए