आँखों में चंद ख़्वाब-नुमा तीर गड़ गए

बहते लहू के डर से पपोटे सिकुड़ गए

मैं आग के क़रीब से गुज़रा न था कभी
ठंडक की नर्म धूप से धागे उधड़ गए

कुछ बेड़ियों ने ख़स्ता किया जिस्म-ओ-जान को
मंज़र तक आते आते मिरे पाँव झड़ गए

कैसी दलीलें कैसी मुनाजात कुछ नहीं
तुझ से बिछड़ना था जिन्हें ख़ुद से बिछड़ गए

माँगी न थी दुआ कभी मैं ने फिर एक शब
उठने की देर थी कि मिरे हाथ झड़ गए

— Osama Khalid

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