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जफ़ा-ए-अहद का इल्ज़ाम उलट भी सकता हूँ
उसे यक़ीन न था मैं पलट भी सकता हूँ
उसे यक़ीन न था मैं पलट भी सकता हूँ
मैं अपने इश्क़ में शाहीं मिज़ाज रखता हूँ
पलट तो जाता हूँ लेकिन झपट भी सकता हूँ
जुनूँ में ज़ुल्म की गर्दन उतार लेता हूँ
तो इक निगाह-ए-मोहब्बत में कट भी सकता हूँ
अदू-ए-शहर मैं बारूद हूँ मोहब्बत का
हदों से बात बढ़ेगी तो फट भी सकता हूँ
बिसात-ए-अर्ज़ पे चाहूँ तो फैल जाऊँ मैं
हो रम्ज़-ए-यार तो दिल में सिमट भी सकता हूँ
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गिन रहे हैं दिल-ए-नाकाम के दिन
फिर वही गर्दिश-ए-अय्याम के दिन
फिर वही गर्दिश-ए-अय्याम के दिन
दुख से आग़ाज़ और ग़म पे अख़ीर
हम ने पाए बड़े इनआ'म के दिन
है यही सोच कर आराम हमें
मिल गए हैं उन्हें आराम के दिन
अब नहीं काम कोई दुनिया का
गोया ये दिन हैं बड़े काम के दिन
हैं वो फिर से मिरे नज़दीक 'नईम'
आए अंदेशा-ए-अंजाम के दिन
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बिखरा है कई बार समेटा है कई बार
ये दिल तिरे अतराफ़ को निकला है कई बार
ये दिल तिरे अतराफ़ को निकला है कई बार
जिस चाँद के दीदार की हसरत में है दुनिया
वो शाम ढले घर मिरे उतरा है कई बार
सुन कर तुझे मदहोश ज़माना है मुझे देख
जिस ने तिरी आवाज़ को देखा है कई बार
अफ़्सोस कि है इश्क़-ए-यगाना से बहुत दूर
यारो तुम्हें हर रोज़ जो होता है कई बार
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ग़ैर के घर सही वो आया तो
ग़म ही मेरे लिए वो लाया तो
ग़म ही मेरे लिए वो लाया तो
दुश्मनों को मुआ'फ़ कर डाला
दोस्तों से फ़रेब खाया तो
पेड़ के घोंसलों का क्या होगा
घर उसे काट कर बनाया तो
फिर मिरे सामने थी इक दीवार
एक दीवार को गिराया तो
किस क़दर ज़ोर से हुई बारिश
मैं ने काग़ज़ का घर बनाया तो
क्या करोगे 'नईम' साल-ए-नौ
पेश-रौ की तरह ही आया तो
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