हमारे साथ हँसते वो हसीं लगते नज़ारे हैं
हमारी झील सी आँखों में ख़्वाबों के शिकारे हैं
हमारी झील सी आँखों में ख़्वाबों के शिकारे हैं
अभी हम से ज़रा सी बात पर रूठे सितारे हैं
कि हम ने रौशनी में चाँद की गेसू सँवारे हैं
खुले रहते हमेशा दो बटन कुर्ते के उन के जो
हमारे हाथ से लगने की ज़िद में आज सारे हैं
इजाज़त है उन्हें ख़ुद को निहारें रात दिन इन
में
बहुत बेचैन आईने निगाहों के हमारे हैं
किसी की याद में जलते हुए वो हम से टकराए
हमारे रेशमी आँचल से तब उलझे शरारे हैं
लिपटती जा रही ये बेल इक सूखे शजर से जो
दुबारा उस शजर के सब्ज़ होने के इशारे हैं
हमारी नम निगाहों से बुझेगी प्यास कैसे अब
समुंदर से ज़ियादा तो हमारे अश्क खारे हैं
हमारे साथ खेलेंगे नहीं हारे वो गर हम से
तभी तो ऐ सखी राज़ी ख़ुशी हम दाँव हारे हैं
हमें कुछ देर ठहरा सा लगा पल इक ख़ुशी का पर
ख़ुशी ठहरे न ग़म ऐसे समय के तेज़ धारे हैं
हरे हैं ज़ख़्म सारे सब्र थोड़ा और कर ले दिल
हवा-ए-हिज्र ने कुछ ख़ुश्क पत्ते ही उतारे हैं
बुरे इस वक़्त ने अच्छा बहुत अच्छा किया ये सब
मुखौटे झूठ के अपनों के चेहरों से उतारे हैं
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सुनो मोहब्बत इक बीमारी है
इकतरफ़ा हो तो बेगारी है
इकतरफ़ा हो तो बेगारी है
इक तेरी ही तो हाँ की ख़ातिर
हम ने जीती बाज़ी हारी है
कहते ख़ुद से तो समझे हम भी
हर इक बात तेरी अख़बारी है
अब तेरी ही यादों से भर ली
हम ने भी दिल की अलमारी है
सोए तुम जाने किस उलझन में
पल-पल रात गुज़रती भारी है
हम झगड़े रूठें इक दूजे से
कभी न टूटे पक्की यारी है
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बेचैन थी लहरें समुंदर की अभी तूफ़ान से
हम देखते थे दूर साहिल पर खड़े हैरान से
हम देखते थे दूर साहिल पर खड़े हैरान से
साँसे महकती हैं अगर मैं यूँ मिलूँ उस से कभी
जैसे हवा मिल के महकती ही रहे लोबान से
मैं राह का पत्थर बनी वो देव मूरत हो गया
कुछ भी नहीं है फ़र्क़ दोनों रह गए बेजान से
दिल एक तरफ़ा इश्क़ की मुश्किल समझता ही नहीं
हैं रास्ते जो इश्क़ के होते नहीं आसान से
मौसम बदलते ही उड़े जो शाख़ से वो हैं कहाँ
लौटे नहीं वापस परिन्दें , हैं शज़र वीरान से
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