ढलती शा

में तन्हा साहिल और समुंदर
कोई लहर न ठहरे पास किनारे आ कर

पार जिगर के तीर नज़र जब होते अक्सर
ऐसे घाइल कभी न होते जल्दी बेहतर

मैं हर पल तेरी यादों में रोती दिलबर
ख़ाली होता नहीं मेरी आँखों का कौसर

लिखने वाले कैसा तुम ने लिखा मुकद्दर
तुम ने ही क्यूँ काट दिए मुझ पंछी के पर

न रास्ता भूले हम न हम ने खाई ठोकर
पीछे हम चलते थे आगे आगे रहबर

बादल बरसे ख़ुशी से या फिर हो के मुज़्तर
होंगी दश्त-ओ-सहरा में बारिशें मुयस्सर

हम को इक ही पल में छोड़ गया तन्हा वो
काटी रातें जिस की ख़ातिर हम ने जगकर

— Meenakshi Masoom

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