कहते हैं कि यूसुफ़ का ख़रीदार तो लाओ
उस जिंस-ए-गिराँ को सर-ए-बाज़ार तो लाओ
उस जिंस-ए-गिराँ को सर-ए-बाज़ार तो लाओ
तमसील-ए-जमाल-ए-निगह-ए-यार तो लाओ
मुमकिन हो जवाब-ए-लब-ओ-रुख़्सार तो लाओ
लो नाम न यारो कि बग़ावत है बड़ी शय
तुम पहले ज़रा जुरअत-ए-गुफ़्तार तो लाओ
अब हुस्न में पैदा हैं पज़ीराई के आसार
तुम इश्क़ में कुछ जुरअत-ए-इज़हार तो लाओ
अज़-राह-ए-अक़ीदत उसे आँखों से लगाएँ
तुम कोई हदीस-ए-लब-ओ-रुख़्सार तो लाओ
उस के लिए ज़ंजीर-ए-बहाराँ भी है काफ़ी
गुलशन में कोई ताज़ा गिरफ़्तार तो लाओ
आराम पस-ए-मंज़िल-ए-दुश्वार है 'एहसास'
साया भी मिलेगा कोई दीवार तो लाओ
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तू ही बता दे जमाल-ए-मा'नी तिरा करें इंतिज़ार कब तक
हयात का ए'तिबार हो भी निगाह का ए'तिबार कब तक
हयात का ए'तिबार हो भी निगाह का ए'तिबार कब तक
जहान-ए-ज़ुल्म-ओ-जफ़ा के मालिक कोई न हो अश्क-बार कब तक
जो दिल ही मजबूर हो चुका हो तो आँख पर इख़्तियार कब तक
मिलेंगे दामन से आ के आख़िर मिरे गरेबाँ के तार कब तक
कोई बताए कि हो सकेगा मिरा जुनूँ पुख़्ता-कार कब तक
जो की किसी ने भी पुरशिश-ए-ग़म तो चश्म-ए-मजबूर हो गई नम
मगर दिल-ए-ज़ब्त-आज़मा के बयान में इख़्तिसार कब तक
वो बाद-ए-सर-सर की बे-क़रारी वो बिजलियाँ और वो शो'ला-बारी
बस अब क़फ़स ही में मुतमइन हूँ नज़र को शौक़-ए-बहार कब तक
ख़िज़ाँ के बे-कैफ़ दौर का भी मिरे गरेबाँ ये कुछ तो हक़ है
जुनूँ को आख़िर बनाए रक्खूँ नियाज़-मंद-ए-बहार कब तक
क़दम क़दम पर सनम-कदा है नज़र नज़र में हरम का मंज़र
तजल्लियाँ ही तो हैं ये आख़िर ब-क़ैद-ए-दीदार-ए-यार कब तक
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अब वो पहले से मेहर-ओ-माह नहीं
कोई आसूदा-ए-निगाह नहीं
कोई आसूदा-ए-निगाह नहीं
जो भी निकला तुम्हारी महफ़िल से
उस को दुनिया में फिर पनाह नहीं
इश्क़ का दर्द फिर बुरा किया है
मौत लाज़िम है इश्तिबाह नहीं
ज़िंदगी ही गुनाह जब ठहरी
ज़िंदगी में कोई गुनाह नहीं
दुश्मनों से तो है हज़र मुमकिन
दोस्तों से कहीं पनाह नहीं
तुम अगर मरकज़-ए-तमन्ना हो
फिर तमन्ना कोई गुनाह नहीं
इक झलक उन की देख ली 'एहसास'
अब कोई मरकज़-ए-निगाह नहीं
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कोई तूफ़ाँ तो नहीं कोई तलातुम तो नहीं
ज़िंदगी नाम है जिस का वो कहीं तुम तो नहीं
ज़िंदगी नाम है जिस का वो कहीं तुम तो नहीं
और क्या कहियेगा आईना-ए-हैरत के सिवा
उन की महफ़िल में मुझे इज़्न-ए-तकल्लुम तो नहीं
जिस तरफ़ देखिए इक नूर-ए-तजल्ली पैदा
आप की बज़्म में शामिल मह-ओ-अंजुम तो नहीं
और क्या दिल की तबाही पे तवज्जोह देता
आप देखें मिरे होंटों पे तबस्सुम तो नहीं
आइना देख के अब प्यार सा आ जाता है
मेरी सूरत से नुमायाँ ये कहीं तुम तो नहीं
मौसम-ए-लाला-ओ-गुल अहद-ए-बहार-ए-गुलशन
ये कहीं आप का अंदाज़-ए-तबस्सुम तो नहीं
मंज़िलें अपनी जगह पर हैं तलब अपनी जगह
जा ही पहुँचेगा कि 'एहसास' अभी गुम तो नहीं
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बे-सबब इश्क़ कब उदास रहा
वो तुम्हारा अदा-शनास रहा
वो तुम्हारा अदा-शनास रहा
ज़िंदगी-भर ख़ुदी का पास रहा इश्क़ कब महव-ए-इल्तिमास रहा
हर फ़साना जो कह चुकी दुनिया
मेरे ग़म का ही इक़्तिबास रहा
जामा-ज़ेबी ब-क़द्र-ए-ज़ौक़ रही इश्क़ हर शख़्स का लिबास रहा
तुम से जब क़ुर्बतें मुयस्सर थीं
दिल तो उस वक़्त भी उदास रहा
ग़म का पैमाना ख़ुद बता देगा
कौन कितना तुम्हारे पास रहा
उन को मुझ से हज़ार दूरी थी
मैं तो 'एहसास' उन के पास रहा
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हाँ मुझे गवारा है इश्क़ का सफ़र तन्हा
उस ने मुझ को छोड़ा है कुछ तो सोच कर तन्हा
उस ने मुझ को छोड़ा है कुछ तो सोच कर तन्हा
ज़ीस्त है मगर सूनी इश्क़ है मगर तन्हा
चश्म सर-बसर वीराँ क़ल्ब सर-बसर तन्हा
वो जमाल की ताबिश जैसे नूर की बारिश
हुस्न-ए-यार की यूरिश और मिरी नज़र तन्हा
दिल की एक इक हसरत छोड़ कर हुई रुख़्सत
हाए-रे ये सन्नाटा हाए-रे ये घर तन्हा
क्या क़यामतें यारो हुस्न के जिलौ में थीं
हम ने दूर तक देखा इश्क़ था मगर तन्हा
ठोकरें ही खाऊँगा गिर के उठ न पाऊँगा
मंज़िल-ए-मोहब्बत में मैं चला अगर तन्हा
दामन-ए-मोहब्बत पर दिल का ख़ून भी होगा
तेरा ग़म मनाएगी कैसे चश्म-ए-तर तन्हा
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तूफ़ान-ए-मोहब्बत लाख उठे तूफ़ान से लेकिन हासिल क्या
जो डूब गई वो कश्ती क्या जो हाथ आया वो साहिल क्या
जो डूब गई वो कश्ती क्या जो हाथ आया वो साहिल क्या
ये बर्क़-ओ-शरर ये शम्स-ओ-क़मर देते हैं निशान-ए-मंज़िल क्या
ऐ दोस्त हमें हो सकता है अंदाज़ा-ए-रंग-ए-महफ़िल क्या
क्या कहिए कि दर्द-ए-फ़ुर्क़त से 'एहसास' तड़पता है दिल क्या
तस्कीन तो माना मुमकिन है तस्कीन से लेकिन हासिल क्या
हम दूर से क्या अंदाज़ा करें क्या नाज़-ओ-नियाज़-ए-उल्फ़त थे
परवाने से होने वाली थी तौहीन-ए-मज़ाक़-ए-महफ़िल क्या
है राह-ए-मोहब्बत राह-ए-रज़ा अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ कैसा
मैं क्यूँ देखूँ आसान है क्या मैं क्यूँ देखूँ है मुश्किल क्या
तौहीन-तलब तौहीन-ए-जुनूँ तौहीन उरूज-ए-मंज़िल है
मैं जिस पे पहुँच जाऊँ हमदम हो सकती है मेरी मंज़िल क्या
इज़हार-ए-ग़म-ए-दिल करना तो 'एहसास' ब-हर-हाल आसाँ है
अश्कों की फ़क़त दो बूंदों का आँखों से निकलना मुश्किल क्या
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सोज़ आवाज़ में लहजे में खनक है साक़ी इश्क़ का तेरे यक़ीं तो नहीं शक है साक़ी
मैं ने कब तुझ से कहा है मुझे शक है साक़ी
तेरे माथे पे सितारों की चमक है साक़ी
क्या तिरी शोख़ी-ए-गुफ़्तार की तशरीह करूँ
कितनी शीरीनी है और कैसा नमक है साक़ी
इश्क़ के सोज़ ने नग़्मात को गर्मी बख़्शी
अब तिरे साज़ में शो'लों की लपक है साक़ी
मेरे साँसों में जो बस जाए तो क्या उस का इलाज
तू नहीं पास मगर तेरी महक है साक़ी
मैं बहक जाऊँ तो ये मेरी तुनुक-ज़र्फ़ी है
और अगर नश्शा न हो किस की हतक है साक़ी
दिल-ए-'एहसास' में जो रूह-ए-तजल्ली है निहाँ
चाँद तारों में कहाँ उस की झलक है साक़ी
Read Fullतेरे माथे पे सितारों की चमक है साक़ी
क्या तिरी शोख़ी-ए-गुफ़्तार की तशरीह करूँ
कितनी शीरीनी है और कैसा नमक है साक़ी
इश्क़ के सोज़ ने नग़्मात को गर्मी बख़्शी
अब तिरे साज़ में शो'लों की लपक है साक़ी
मेरे साँसों में जो बस जाए तो क्या उस का इलाज
तू नहीं पास मगर तेरी महक है साक़ी
मैं बहक जाऊँ तो ये मेरी तुनुक-ज़र्फ़ी है
और अगर नश्शा न हो किस की हतक है साक़ी
दिल-ए-'एहसास' में जो रूह-ए-तजल्ली है निहाँ
चाँद तारों में कहाँ उस की झलक है साक़ी
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