ज़िंदगी चमके मिरी मेहर-ए-दरख़्शाँ की तरह
तुम अगर साथ दो मेरा शब-ए-हिज्राँ की तरह
फिर मैं ख़ुद आप से ता'बीर-ए-मोहब्बत पूछूँ
आप आ जाएँ किसी ख़्वाब-ए-परेशाँ की तरह
लाख क़ुर्बानियाँ इक ज़ात की ख़ातिर से हुईं
कोई पत्थर भी न पूजा गया इंसाँ की तरह
और क्या पेश करूँ हासिल-ए-ज़ब्त-ए-ग़म-ए-इश्क़
चश्म-ए-गिर्यां की तरह चेहरा-ए-ख़ंदाँ की तरह
हाथ आ जाए अगर गोशा-ए-दामान-ए-करम
वुसअ'तें दूँ मैं उसे आलम-ए-इम्काँ की तरह
और क्या लाऊँ मैं तकमील-ए-बहाराँ का सुबूत
अपने दामन की तरह अपने गरेबाँ की तरह
आँधियाँ आती हैं गुल करने को 'एहसास' बहुत
झिलमिलाता हूँ चराग़-ए-तह-ए-दामाँ की तरह
— Ehsas Muradabadi















