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ज़ीस्त यूँही न रहेगी मग़्मूम
ज़िंदगानी को बदलना होगा
ज़िंदगानी को बदलना होगा
लाख आमादा-ए-साज़िश है ये शब
इस शब-ए-तीरा को ढलना होगा
मौत का साया लरज़ता है तो क्या
वक़्त आलाम को लाया है तो क्या
नामा-ए-दर्द जो आया है तो क्या
ग़म को सह जाएँ दिलावर बन कर
पी लें दरिया को समुंदर बन कर
ग़म तो आते ही रहेंगे पैहम
आते-जाते ही रहेंगे हर-दम
ज़ख़्म ख़ुद पैदा करेंगे मरहम
ग़म-ओ-अंदोह की कुछ बात नहीं
ये कोई लम्हा-ए-हैहात नहीं
अज़्म-ए-परवाज़ न देने पाए
अपनी आवाज़ न देने पाए
रात तारीक भी सुनसान भी है
अज़्म के गीत तो गाएँ आओ
शब-ए-दीजूर को रौशन तो करें
शम-ए-उम्मीद जलाएँ आओ
Read Fullइस शब-ए-तीरा को ढलना होगा
मौत का साया लरज़ता है तो क्या
वक़्त आलाम को लाया है तो क्या
नामा-ए-दर्द जो आया है तो क्या
ग़म को सह जाएँ दिलावर बन कर
पी लें दरिया को समुंदर बन कर
ग़म तो आते ही रहेंगे पैहम
आते-जाते ही रहेंगे हर-दम
ज़ख़्म ख़ुद पैदा करेंगे मरहम
ग़म-ओ-अंदोह की कुछ बात नहीं
ये कोई लम्हा-ए-हैहात नहीं
अज़्म-ए-परवाज़ न देने पाए
अपनी आवाज़ न देने पाए
रात तारीक भी सुनसान भी है
अज़्म के गीत तो गाएँ आओ
शब-ए-दीजूर को रौशन तो करें
शम-ए-उम्मीद जलाएँ आओ
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शाहिद-ए-दहर की तस्वीर बनाने वाले
अपनी तस्वीर की जानिब भी ज़रा एक नज़र
अपनी तस्वीर की जानिब भी ज़रा एक नज़र
ऐ हर इक ज़र्रे की तक़दीर बनाने वाले
अपनी तक़दीर के ख़ाकों को फ़रामोश न कर
तेरी तक़दीर है आईना-ए-तक़दीर जहाँ
ख़ूब मा'लूम है तेरा ग़म-ए-तन्हा मुझ को
तुझ में उठने के निशाँ तुझ में सँभलने के निशाँ
तेरी सूरत में नज़र आता है फ़र्दा मुझ को
मुंतशिर हो के ज़माने में हुआ ख़ार-अो-ज़बूँ
हो मुनज़्ज़म तो क़वी तुझ सा ज़माने में नहीं
अन-गिनत हाथ तिरे जब भी उठे हैं मिल कर
तेरे क़दमों पे झुकी आ के चटानों की जबीं
ख़ालिक़-ए-नान-ए-जवीं तू है ज़ियाँ तेरी है
फ़िक्र की बात नहीं सारा जहाँ तेरा है
क़ुव्वतें तुझ में जो हैं उन की ख़बर तुझ को नहीं
जो अयाँ है वो तिरा है जो है निहाँ तेरा है
ग़म को सीने में दबा रक्खा है तू ने लेकिन
ग़म बड़ी चीज़ है तो उस से कोई काम तो ले
तिश्नगी बढ़ के कहीं तेरा गला घोंट न दे
मय भी मिल जाएगी साक़ी से मगर जाम तो ले
Read Fullअपनी तक़दीर के ख़ाकों को फ़रामोश न कर
तेरी तक़दीर है आईना-ए-तक़दीर जहाँ
ख़ूब मा'लूम है तेरा ग़म-ए-तन्हा मुझ को
तुझ में उठने के निशाँ तुझ में सँभलने के निशाँ
तेरी सूरत में नज़र आता है फ़र्दा मुझ को
मुंतशिर हो के ज़माने में हुआ ख़ार-अो-ज़बूँ
हो मुनज़्ज़म तो क़वी तुझ सा ज़माने में नहीं
अन-गिनत हाथ तिरे जब भी उठे हैं मिल कर
तेरे क़दमों पे झुकी आ के चटानों की जबीं
ख़ालिक़-ए-नान-ए-जवीं तू है ज़ियाँ तेरी है
फ़िक्र की बात नहीं सारा जहाँ तेरा है
क़ुव्वतें तुझ में जो हैं उन की ख़बर तुझ को नहीं
जो अयाँ है वो तिरा है जो है निहाँ तेरा है
ग़म को सीने में दबा रक्खा है तू ने लेकिन
ग़म बड़ी चीज़ है तो उस से कोई काम तो ले
तिश्नगी बढ़ के कहीं तेरा गला घोंट न दे
मय भी मिल जाएगी साक़ी से मगर जाम तो ले
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मैं तो हैरान हूँ किस तरह कटे राह-ए-हयात
इक नया मोड़ बहर-गाम उभर आता है
इक नया मोड़ बहर-गाम उभर आता है
सर-ए-तारीकी-ए-शब खुल जो गया आख़िर-ए-शब
फिर नया राज़ ब-हर-सुब्ह निखर आता है
जाँचता फिरता हूँ माज़ी के खंडर हसरत से
देखता फिरता हूँ हर नक़्श-ए-हसीं हैरत से
सोचता फिरता हूँ कौन आया था कब आया था
उस जगह साथ लिए काविश-ए-तकमील-ए-हयात
ढूँढ़ता फिरता हूँ शायद कि ये माज़ी के नुक़ूश
कुछ पता दें कि शब रोज़ बताऊँ क्यूँकर
ग़म के क़ाबिल मैं ख़ुद अपने को बनाऊँ क्यूँकर
नित नए ग़म के गिराँ-बार उठाऊँ क्यूँकर
दूर इक हुस्न का पंछी सा नज़र आता है
क़ैद कर लूँ उसे शायद कि बहल जाए ये दिल
दिल की आवाज़ थकी-हारी फ़सुर्दा बोझल
जिस ने तख़ईल की दुनिया में मचा दी हलचल
मैं कोई तिफ़्ल नहीं हूँ कि बहल जाऊँगा
न करो क़ैद मुझे हुस्न के बहलाओं में
इक नज़र झाँक के देखो मिरी आशाओं में
तुम ही ख़ुद शर्म से हो जाओगे पानी पानी
एक बेबस को मगर देते हो क्यूँ ऐसा फ़रेब
अब मैं किस रह में ग़म-ए-दिल का मुदावा ढूँडूँ
अन-गिनत फ़िक्र की राहें नज़र आती हैं मुझे
इक नया मोड़ ब-हर-गाम उभर आता है
और हर मोड़ नज़र आता है कितना दिलकश
जन्नत-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र चाँद-सितारों का जहाँ
जैसे अंदाज़-ए-सबा जैसे बहारों का जहाँ
जैसे जादू भरे नैनों के निगारों का जहाँ
जैसे मा'सूम निगाहों में इशारों का जहाँ
जैसे फूलों भरी शाख़ों पे शरारों का जहाँ
उफ़ मैं किस रह में ग़म-ए-दिल का मुदावा ढूँडूँ
किस तरफ़ जाऊँ किसे दिल से लगाए रक्खूँ
ज़िंदगी भर कि फिर उस ज़ीस्त को जन्नत समझूँ
हर-दम एक एक नफ़स चाहे जिधर जा के रहूँ
कौन इस ज़ीस्त को कर सकता है महदूद-ओ-मुक़ीम
उस की एक एक अदा बर्क़-सिफ़त शो'ला-नफ़स
जी रहा हूँ नई उम्मीद लिए हर इक पल
ग़म लिए दिल में कि मैं क्या न बना क्यूँ न बना
ख़ुश हूँ हर ग़म से कि इदराक की सौग़ात है ये
सोच लेता हूँ कि मैं क्या हूँ यही क्या कम है
Read Fullफिर नया राज़ ब-हर-सुब्ह निखर आता है
जाँचता फिरता हूँ माज़ी के खंडर हसरत से
देखता फिरता हूँ हर नक़्श-ए-हसीं हैरत से
सोचता फिरता हूँ कौन आया था कब आया था
उस जगह साथ लिए काविश-ए-तकमील-ए-हयात
ढूँढ़ता फिरता हूँ शायद कि ये माज़ी के नुक़ूश
कुछ पता दें कि शब रोज़ बताऊँ क्यूँकर
ग़म के क़ाबिल मैं ख़ुद अपने को बनाऊँ क्यूँकर
नित नए ग़म के गिराँ-बार उठाऊँ क्यूँकर
दूर इक हुस्न का पंछी सा नज़र आता है
क़ैद कर लूँ उसे शायद कि बहल जाए ये दिल
दिल की आवाज़ थकी-हारी फ़सुर्दा बोझल
जिस ने तख़ईल की दुनिया में मचा दी हलचल
मैं कोई तिफ़्ल नहीं हूँ कि बहल जाऊँगा
न करो क़ैद मुझे हुस्न के बहलाओं में
इक नज़र झाँक के देखो मिरी आशाओं में
तुम ही ख़ुद शर्म से हो जाओगे पानी पानी
एक बेबस को मगर देते हो क्यूँ ऐसा फ़रेब
अब मैं किस रह में ग़म-ए-दिल का मुदावा ढूँडूँ
अन-गिनत फ़िक्र की राहें नज़र आती हैं मुझे
इक नया मोड़ ब-हर-गाम उभर आता है
और हर मोड़ नज़र आता है कितना दिलकश
जन्नत-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र चाँद-सितारों का जहाँ
जैसे अंदाज़-ए-सबा जैसे बहारों का जहाँ
जैसे जादू भरे नैनों के निगारों का जहाँ
जैसे मा'सूम निगाहों में इशारों का जहाँ
जैसे फूलों भरी शाख़ों पे शरारों का जहाँ
उफ़ मैं किस रह में ग़म-ए-दिल का मुदावा ढूँडूँ
किस तरफ़ जाऊँ किसे दिल से लगाए रक्खूँ
ज़िंदगी भर कि फिर उस ज़ीस्त को जन्नत समझूँ
हर-दम एक एक नफ़स चाहे जिधर जा के रहूँ
कौन इस ज़ीस्त को कर सकता है महदूद-ओ-मुक़ीम
उस की एक एक अदा बर्क़-सिफ़त शो'ला-नफ़स
जी रहा हूँ नई उम्मीद लिए हर इक पल
ग़म लिए दिल में कि मैं क्या न बना क्यूँ न बना
ख़ुश हूँ हर ग़म से कि इदराक की सौग़ात है ये
सोच लेता हूँ कि मैं क्या हूँ यही क्या कम है
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जज़्बा-ए-नौ भी तो है हसरत-ए-नाकाम के साथ
ख़्वाहिश-ए-सुब्ह उभरती तो है हर शाम के साथ
ख़्वाहिश-ए-सुब्ह उभरती तो है हर शाम के साथ
हो वो तहसीन के हमराह कि दुश्नाम के साथ
आ तो जाता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
तेरे कूचे से भी गुज़रा हूँ मैं ऐ हुस्न-ए-तलब
सुब्ह के साथ कभी और कभी शाम के साथ
मुश्किलें राह में आती तो बहुत हैं लेकिन
याद कर लेता हूँ मैं तुझ को हर इक गाम के साथ
पहले मेरा था ये ग़म अब है ज़माने भर का
ग़म भी गर्दिश में रहा गर्दिश-ए-अय्याम के साथ
झूमती आती है ख़ुशबू से भरी आती है
जब भी आती है सबा आप के पैग़ाम के साथ
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जब तसव्वुर में किसी को पास पा लेता हूँ मैं
इक निराले कैफ़ को दिल में बसा लेता हूँ मैं
इक निराले कैफ़ को दिल में बसा लेता हूँ मैं
जब भी याद आती हैं तेरे गेसुओं की राहतें
रात की तारीकियों में मुस्कुरा लेता हूँ मैं
चाहता हूँ जब कि तेरी याद को रौशन करूँ
ग़म की वादी में नई शमएँ जला लेता हूँ मैं
राह में सूखा हुआ पत्ता भी मिलता है अगर
उस परेशाँ-हाल को साथी बना लेता हूँ मैं
सोचता हूँ कितना ग़म-अंदोज़ है तेरा ख़याल
फिर उसी से इक नया जादू जगा लेता हूँ मैं
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आ के साहिल के क़रीं जाता हूँ साहिल से परे
आ के मंज़िल पर चला जाता हूँ मंज़िल से परे
आ के मंज़िल पर चला जाता हूँ मंज़िल से परे
अपनी मंज़िल पर पहुँच कर सोचने लगता हूँ मैं
उफ़ रे वो मंज़र सुहाना है जो मंज़िल से परे
देख वो लहरों का मंज़र देख वो तूफ़ाँ का खेल
देख ऐ साहिल-नशीं क्या शय है साहिल से परे
रात-दिन देती ही रहती है तिरे जलवोें का लुत्फ़
वो जो इक तस्वीर रक्खी है कहीं दिल से परे
देख ऐ शौक़-ए-नज़र नज़्ज़ारा-हा-ए-दिल-फ़रेब
पर्दा-हा-ए-जुरअत-आमोज़ उस के महमिल से परे
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