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आँखों से अयाँ ज़ख़्म की गहराई तो अब है
अब आ भी चुको वक़्त-ए-मसीहाई तो अब है
अब आ भी चुको वक़्त-ए-मसीहाई तो अब है
पहले ग़म-ए-फ़ुर्क़त के ये तेवर तो नहीं थे
रग रग में उतरती हुई तन्हाई तो अब है
तारी है तमन्नाओं पे सकरात का आलम
हर साँस रिफ़ाक़त की तमन्नाई तो अब है
कल तक मिरी वहशत से फ़क़त तुम ही थे आगाह
हर गाम पे अंदेशा-ए-रुस्वाई तो अब है
क्या जाने महकती हुई सुब्हों में कोई दिल
शामों में किसी दर्द की रा'नाई तो अब है
दिल-सोज़ ये तारे हैं तो जाँ-सोज़ ये महताब
दर-असल शब-ए-अंजुमन-आराई तो अब है
सफ़-बस्ता हैं हर मोड़ पे कुछ संग-ब-कफ़ लोग
ऐ ज़ख़्म-ए-हुनर लुत्फ़-ए-पज़ीराई तो अब है
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मुझ से मुख़्लिस था न वाक़िफ़ मिरे जज़्बात से था
उस का रिश्ता तो फ़क़त अपने मफ़ादात से था
उस का रिश्ता तो फ़क़त अपने मफ़ादात से था
अब जो बिछड़ा है तो क्या रोएँ जुदाई पे तिरी
यही अंदेशा हमें पहली मुलाक़ात से था
दिल के बुझने का हवाओं से गिला क्या करना
ये दिया नज़्अ' के आलम में तो कल रात से था
मरकज़-ए-शहर में रहने पे मुसिर थी ख़िल्क़त
और मैं वाबस्ता तिरे दिल के मज़ाफ़ात से था
मैं ख़राबों का मकीं और तअ'ल्लुक़ मेरा
तेरे नाते कभी ख़्वाबों के महल्लात से था
लब-कुशाई पे खुला उस के सुख़न से इफ़्लास
कितना आरास्ता वो अत्लस-ओ-बानात से था
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छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ
लोग ज़िंदा हैं अजब सूरत-ए-हालात के साथ
लोग ज़िंदा हैं अजब सूरत-ए-हालात के साथ
फ़ैसला ये तो बहर-हाल तुझे करना है
ज़ेहन के साथ सुलगना है कि जज़्बात के साथ
गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर
इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ
अब के ये सोच के तुम ज़ख़्म-ए-जुदाई देना
दिल भी बुझ जाएगा ढलती हुई इस रात के साथ
तुम वही हो कि जो पहले थे मिरी नज़रों में
क्या इज़ाफ़ा हुआ इन अतलस ओ बानात के साथ
इतना पसपा न हो दीवार से लग जाएगा
इतने समझौते न कर सूरत-ए-हालात के साथ
भेजता रहता है गुम-नाम ख़तों में कुछ फूल
इस क़दर किस को मोहब्बत है मिरी ज़ात के साथ
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धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा
मैं और मेरे ज़ख़्मी एहसासात अकेला कमरा
मैं और मेरे ज़ख़्मी एहसासात अकेला कमरा
गए दिनों की तस्वीरों के बुझते हुए नुक़ूश
ताज़ा तर्क-ए-त'अल्लुक़ के सदमात अकेला कमरा
दोश-ए-हवा पर उड़ने वाले ख़िज़ाँ के आख़िरी पत्ते
अपनी अकेली जान ग़म-ए-हालात अकेला कमरा
आख़िरी शब के चाँद से करना बालकनी में बातें
उस के शहर में होटल की ये रात अकेला कमरा
मेरी सिसकती आवाज़ों से गूँजती हैं दीवारें
सुनता है दिन रात मरे नग़्मात अकेला कमरा
सब सामान बहम हैं 'साजिद' लिखने लिखाने के
ख़ून-ए-जिगर और आँसू दिल की दवात अकेला कमरा
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जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
जो मोहब्बतों की असास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
जो मोहब्बतों की असास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
जिन्हें मानता ही नहीं ये दिल वही लोग मेरे हैं हम-सफ़र
मुझे हर तरह से जो रास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
मुझे लम्हा-भर की रफ़ाक़तों के सराब और सताएँगे
मिरी उम्र-भर की जो प्यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
ये ख़याल सारे हैं आरज़ी ये गुलाब सारे हैं काग़ज़ी
गुल-ए-आरज़ू की जो बास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
जिन्हें कर सका न क़ुबूल मैं वो शरीक-ए-राह-ए-सफ़र हुए
जो मिरी तलब मिरी आस थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
मिरी धड़कनों के क़रीब थे मिरी चाह थे मिरा ख़्वाब थे
वो जो रोज़-ओ-शब मिरे पास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
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तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो
मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो
मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो
मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द
मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो
किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता
मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो
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