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जले हैं दिल न चराग़ों ने रौशनी की है
वो शब-परस्तों ने महफ़िल में तीरगी की है
वो शब-परस्तों ने महफ़िल में तीरगी की है
हदीस-ए-ज़ुल्म-ओ-सितम है हनूज़ ना-गुफ़्ता
हनूज़ मोहर ज़बानों पे ख़ामुशी की है
उस एक जाम ने साक़ी की जो अता ठहरा
सुकूँ दिया है न कुछ दर्द में कमी की है
हमें ये नाज़ न क्यूँ हो कि नय-नवाज़ हैं हम
हमारे होंटों ने ईजाद नग़्मगी की है
चमन में सिर्फ़ हमीं राज़दाँ हैं काँटों के
गुलों के साथ बसर हम ने ज़िंदगी की है
फ़िराक़-ए-यार ने बख़्शी है वस्ल की लज़्ज़त
ख़याल-ए-यार ने ज़ुल्मत में रौशनी की है
हैं जिस की दीद से महरूम आज तक 'ख़ावर'
उसी की हम ने तसव्वुर में बंदगी की है
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खड़ा था कौन कहाँ कुछ पता चला ही नहीं
मैं रास्ते में किसी मोड़ पर रुका ही नहीं
मैं रास्ते में किसी मोड़ पर रुका ही नहीं
हवाएँ तेज़ थीं इतनी कि एक दिल के सिवा
कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जला ही नहीं
कहाँ से ख़ंजर-ओ-शमशीर आज़माता मैं
मिरे अदू से मिरा सामना हुआ ही नहीं
दुखों की आग में हर शख़्स जल के राख हुआ
किसी ग़रीब के दिल से धुआँ उठा ही नहीं
हमारा शहर-ए-तमन्ना बहुत हसीं था मगर
उजड़ के रह गया ऐसा कि फिर बसा ही नहीं
वो बन गया मिरा नाक़िद पता नहीं क्यूँ कर
मिरा कलाम तो उस ने कभी पढ़ा ही नहीं
मैं अपने दौर की आवाज़ था मगर 'ख़ावर'
किसी ने बज़्म-ए-जहाँ में मुझे सुना ही नहीं
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आग ही काश लग गई होती
दो घड़ी को तो रौशनी होती
दो घड़ी को तो रौशनी होती
लोग मिलते न जो नक़ाबों में
कोई सूरत न अजनबी होती
पूछते जिस से अपना नाम ऐसी
शहर में एक तो गली होती
बात कोई कहाँ ख़ुशी की थी
दिल को किस बात की ख़ुशी होती
मौत जब तेरे इख़्तियार में है
मेरे क़ाबू में ज़िंदगी होती
महक उठता नगर नगर 'ख़ावर'
दिल की ख़ुशबू अगर उड़ी होती
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