Alimullah

Top 10 of Alimullah

    कीता कहीं पुकार ऐ ग़ाफ़िल बिया बिया
    फिरता है क्यूँ तू भूल अपस का पिया पिया

    बूझा है क्यूँ अजल को अपस से बईद कर
    ग़फ़लत में चुप उमर को तू ज़ाए किया किया

    अब तो समझ टुक एक तिरा जान कौन है
    पापा है जी को जिस ने मुआ नहीं जिया जिया

    लेकिन नहीं है काम हर इक ख़ाम का यहाँ
    आशिक़ वही हुआ है कि जो सर दिया दिया

    पहुँचा है जो कि इश्क़ में मंज़िल को वस्ल की
    बे-शक सकल जहाँ में हुआ बे-रिया रिया

    जो कुइ क़दम को अपने रखा राह-ए-इश्क़ में
    कहते हैं आशिक़ाँ की वो मंज़िल लिया लिया

    दोनों जहाँ से काम नहीं मुझ को ऐ 'अलीम'
    बस है मुझे करीम दिया सो हिया हिया
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    Alimullah
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    नको नसीहत करो अज़ीज़ाँ निगा है हमना मुहन सूँ मीता
    तजा हूँ मैं रीत सब जहाँ की जिधाँ पिया सूँ प्रीत कीता

    सनम की उल्फ़त में दिल अपस का रखा था कर चाक चाक जूँ गुल
    कहो रफ़ू-गर जहाँ में ऐसा कहाँ जो दिल का ये चाक सीता

    जहाँ के सय्याद के शिकाराँ तमाम मर कर शिकार होते
    जो दाम-ए-उल्फ़त में आ गिरा सो मुआ नहीं है हुआ है जीता

    अबस है ये फ़िक्र ऐ अज़ीज़ाँ लगे हो रोज़ों की तुम फ़िकर में
    ये ज़िंदगानी है दो दिनन की उड़े है सर पर अजल का चीता

    करीम तेरा ये दीद मुझ को सदा हुआ है ग़िज़ा ये रूह का
    'अलीम' के तईं तो ज़िंदगी से नहीं है पर्वा चरण का हीता
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    9
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    तेज़ी तिरे मिज़्गाँ की ये नश्तर से कहूँगा
    अबरू की शिकायत दम-ए-ख़ंजर से कहूँगा

    हम-रंग-ए-शम्अ' इश्क़ में तेरे हूँ व-लेकिन
    ये सोज़-ए-जिगर आतिश मुजमर से कहूँगा

    देखा हूँ मैं जिस रोज़ से तुझ हुस्न का झलका
    है दिल में कभी जामा-ए-अनवर से कहूँगा

    तंगी जो तिरे पिस्ता-दहन की है सरासर
    सर-बस्ता सुख़न गुंचा-ए-जौहरस कहूँगा

    सैराब न हूँ तुझ लब-ए-शीरीं से अगर मैं
    ये तिश्ना-लबी चश्मा-ए-कौसर से कहूँगा

    बूझा है 'अलीम' आज कि है हुस्न का तू गंज
    ये ख़ुश-ख़बरी आशिक़-ए-बे-ज़र से कहूँगा
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    Alimullah
    8
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    गर इश्क़ है तो देखने पिव को शिताब आ
    ला-शक हो हक़ की रह में चला बे-हिजाब आ

    उस हुस्न-ए-बे-नज़ीर के दरसन को देखने
    सब ख़ानुमाँ सूँ हो के अपस के ख़राब आ

    दरिया में दिल के इश्क़ सूँ होने के तईं मुहीत
    ख़ाली हो सब ख़ुदी सूँ निकल जूँ हबाब आ

    क्या देखता है सूरत-ए-ख़ुर्शीद और चंद्र
    हर इक नज़र में देख हज़ार आफ़्ताब आ

    हर-दम 'अलीम' दिल के नज़र को दिया है ताब
    अपने करम सूँ क़िबला-ए-वाला जनाब आ
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    Alimullah
    7
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    आया है मगर इश्क़ में दिलदार हमारा
    हर तन में हुआ जान हर इक जिस्म का न्यारा

    बे-मिस्ल उस के हुस्न को कहते हैं दो-आलम
    दिस्ता है हर इक ख़ल्क़ को अपने सूँ पियारा

    मन-कान न हो यार के दरसन को न जाने
    आया नहीं कुइ फिर के जहाँ बीच दोबारा

    उस शम-ए-दरख़्शाँ को अपस साथ तू ले जा
    वर नहीं तो क़बर बीच है ज़ुल्मात अँधारा

    करने में जमा ज़र के गँवाता है उमर क्यूँ
    आख़िर को निकल जाएगा सब छोड़ ज़रारा

    फ़रज़ंद-ओ-अज़ीज़ान सकल ख़्वेश क़बीला
    दुनिया है दग़ाबाज़ नहीं कोई तुम्हारा

    बेहद है 'अलीम' इश्क़ के ता'लीम का तूमार
    पाया नहीं कुइ इश्क़ के दरिया का किनारा
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    Alimullah
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    अक़्ल-ए-जुज़वी छोड़ कर ऐ यार फ़िक्र-ए-कुल करो
    मिशअल-ए-दिल को चिता फ़ानी चराग़ाँ गुल करो

    दिल लगाओ एक से दोनों जहाँ जिस का ज़ुहूर
    बुल-हवस हो कर न हरगिज़ आदत-ए-बुलबुल करो

    मैं मोहब्बत सूँ हमेशा इश्क़ में सरशार हूँ
    नश्शा-ए-फ़ानी सूँ मत ख़ातिर को ख़ू-ए-मुल करो

    ज़ुल्फ़-ओ-आरिज़ है मुनव्वर देख वज्हुल्लाह का
    तुम न को सैर-ए-चमन और ख़्वाहिश-ए-सुम्बुल करो

    क़ौल पर ला-तक़्नतू के रहो हमेशा जम्अ''-दिल
    मत तुम्हें ख़ातिर परेशाँ सूरत-ए-काकुल करो

    ख़ौफ़ मत रक्खो किसी दुश्मन से दिल में यक रती
    पुश्त-बाँ अपना हमेशा साहब-ए-दुलदुल करो

    ऐ 'अलीमुल्लाह' अव्वल इश्क़ में मिस्मार हो
    आशिक़ों में बा'द अपने आशिक़ी का ग़ुल करो
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    अक़्ल को छोड़ इश्क़ में आ जा
    ख़ाम है इश्क़ सूँ जो कोई ला जा
    इश्क़-बाज़ी में दिल को रख साबित
    अपना माशूक़ आप में पा जा
    इश्क़ की राह में है यक-रंगी
    क्या वहाँ बादशाह क्या राजा
    इश्क़ की राह में मुसाफ़िर को
    आशिक़ाँ बोलते हैं जल्द जा जा

    शह सूँ पाया है जब विसाल 'अलीम'
    फ़ौज-ए-उश्शाक़ में तबल बाजा
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    इश्क़ आ हम सूँ किया जब राम राम
    हम किसी हाजी को नहीं करते सलाम

    मज्लिस-ए-रिंदाँ में ज़ाहिद नहीं सुना
    है सबक़ अव्वल वहाँ का जाम जाम

    गर ख़लासी हश्र की मंगता है तू
    रिंदगी के पी मय-ए-गुलफ़ाम फ़ाम

    पूछता है क्या हमारे रम्ज़ को
    बे-समझ बे-इश्क़ ज़ाहिद ख़ाम ख़ाम

    गर दिखा दें यार के काकुल का तार
    सुब्ह को आलम कहेगा शाम शाम

    आशिक़ी के मोहक
    में में हैं निकात
    जान-आे-तन और अक़्ल-ओ-दिल सब दाम दाम

    ऐ 'अलीमुल्लाह' ज़ाहिद को लताड़
    फ़ाज़िलाँ में ख़ुश मचाया धूम-धाम
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    Alimullah
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    नूर-ए-हक़ बे-हिजाब इश्क़-अल्लाह
    याद-ए-दिलबर शराब इश्क़-अल्लाह

    मी मोहब्बत के आसमाँ पे ज़ुहूर
    परतव-ए-आफ़्ताब इश्क़-अल्लाह

    जब दिखाता है रब जमाल अपना
    देख ले बे-नक़ाब इश्क़-अल्लाह
    इश्क़ में दिल-रुबा के ऐ ज़ाहिद
    सर-निगूँ शैख़-ओ-शाब इश्क़-अल्लाह

    बज़्म-ए-लाहूत में सुन ऐ दरवेश
    है सदा-ए-रुबाब इश्क़-अल्लाह

    जो सुना है सदा-ए-सर-निगूँ
    वो चे पाया शिताब इश्क़-अल्लाह
    इश्क़ का जोश दिल के दरिया में
    बोलता हर हबाब इश्क़-अल्लाह

    फ़ैज़ मुर्शिद सूँ मुस्तफ़ीज़ हुआ
    दिल सूँ पाया जनाब इश्क़-अल्लाह

    बोल इस का जवाब अलीमुल्लाह
    जो कहा है तुराब इश्क़-अल्लाह
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    Alimullah
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