शहर-ए-जाँ पर जो तिरी याद का लश्कर टूटा
एक हमले में हिसार-ए-दिल-ए-ख़ुद-सर टूटा
एक हमले में हिसार-ए-दिल-ए-ख़ुद-सर टूटा
जैसे इक बर्क़ सी लहराई पस-ए-पर्दा-ए-अब्र
जैसे इक चाँद सर-ए-शाख़-ए-सनोबर टूटा
आ गया ता ब गिरेबान-ए-शफ़क़ दस्त-ए-सहाब
बाम-ए-अफ़्लाक पे नाहीद का महवर टूटा
मेरे साग़र में उतर आया किसी शाम का अक्स
मेरी आँखों में किसी हुस्न का नश्तर टूटा
दिल की गहराई में फिर जाग उठा शो'ला-ए-दर्द
मुंजमिद था जो मिरे ग़म का समुंदर टूटा
दश्त-ए-अय्याम से लौटी किसी एहसास की गूँज
मा'बद-ए-जाँ में किसी वहम का पैकर टूटा
फिर पुर-असरार यका यक हुई ख़ामोशी-ए-शब
फिर कोई जाम किसी हाथ से गिर कर टूटा
कासनी धूप के आँसू मिरी आँखों से बहे
जैसे इक महर-ए-दरख़्शाँ मिरे अंदर टूटा
ग़ुल मचाते हुए रंगों के परिंदे निकले
संग-ए-हैरत से जब आईना-ए-मंज़र टूटा
गुम्बद-ए-गोश में गूँजी फिर इक आवाज़-ए-शिकस्त
क्या ख़बर ये मिरा दिल टूटा कि साग़र टूटा
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पल में समुंदर पल में किनारा बन जाता है इश्क़ को जैसा समझो वैसा बन जाता है
अहल-ए-तमन्ना चुप रहने में ख़ैर न जानें
ख़ामोशी से भी अफ़्साना बन जाता है
पास आओ तो आड़ी तिरछी चंद लकीरें
दूर से देखो तो इक चेहरा बन जाता है
दुनिया के मेले में आ निकले हो प्यारे
देख के चलना वर्ना तमाशा बन जाता है
चैन आया तो तेरी सूरत ध्यान में उतरी
ठहरा हुआ पानी आईना बन जाता है
सुब्ह को तेरी याद जगाने आ जाती है
रात को तेरा ध्यान बिछौना बन जाता है
वो किस का है ये दुनिया को ख़बर नहीं है
जो उस से मिलता है उसी का बन जाता है
मैं अपने अल्फ़ाज़ के पीछे छुप जाता हूँ
मेरा सुख़न ही मेरा चेहरा बन जाता है
Read Fullख़ामोशी से भी अफ़्साना बन जाता है
पास आओ तो आड़ी तिरछी चंद लकीरें
दूर से देखो तो इक चेहरा बन जाता है
दुनिया के मेले में आ निकले हो प्यारे
देख के चलना वर्ना तमाशा बन जाता है
चैन आया तो तेरी सूरत ध्यान में उतरी
ठहरा हुआ पानी आईना बन जाता है
सुब्ह को तेरी याद जगाने आ जाती है
रात को तेरा ध्यान बिछौना बन जाता है
वो किस का है ये दुनिया को ख़बर नहीं है
जो उस से मिलता है उसी का बन जाता है
मैं अपने अल्फ़ाज़ के पीछे छुप जाता हूँ
मेरा सुख़न ही मेरा चेहरा बन जाता है
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रखना हो तो दिल को निगह-ए-यार में रखना
इस जिंस-ए-गिरामी को न बाज़ार में रखना
इस जिंस-ए-गिरामी को न बाज़ार में रखना
हम अहल-ए-तमन्ना की बस इतनी है करामत
इक ख़्वाब सदा दीदा-ए-बेदार में रखना
अंजाम-ए-तरब भी तो तअस्सुफ़ है सो इस बार
ख़ुशियों को भी तख़्मीना-ए-आज़ार में रखना
अब घर जो बनाना कोई ख़्वाबों की ज़मीं पर
इमकान-तग़य्युर दर-ओ-दीवार में रखना
नाहक़ किसी मज़लूम पर उट्ठे तो लचक जाए
ये जौहर-ए-नायाब भी तलवार में रखना
ये किया कि हर इक दिल में जगाना तलब-ए-हुस्न
और ख़ुद को निहाँ पर्दा-ए-असरार में रखना
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शब-ए-हयात में क़िंदील-ए-आरज़ू तिरा ग़म
सुकूत-ए-जाँ में फ़रोज़ाँ सदा-ए-हू तिरा ग़म
सुकूत-ए-जाँ में फ़रोज़ाँ सदा-ए-हू तिरा ग़म
रम-ए-नफ़स में मचलती हुई सदा तिरा नाम
रग-ए-गुलू में सुलगता हुआ लहू तिरा ग़म
हरीम-ए-ज़ात में रौशन चराग़ के मानिंद
रियाज़-ए-शौक़ में नख़्ल-ए-सुबुक-नुमू तिरा ग़म
मिरे शुऊ'र के ज़िंदाँ में इक दरीचा-ए-नूर
मरे वजूद के सहरा में आब-जू तिरा ग़म
लगन कोई भी हो उन्वान-ए-जुस्तुजू तिरा हुस्न
सुख़न किसी से हो मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू तिरा ग़म
सुरूर-ओ-कैफ़ की सब महफ़िलों में देख लिया
कहीं शराब तिरा ग़म कहीं सुबू तिरा ग़म
ख़याल-ओ-फ़िक्र के सब मकतबों में पूछ लिया
मताअ'-ए-दानिश-ओ-तहक़ीक़-ओ-जुस्तजू तिरा ग़म
समा-ओ-सोज़ की सब मजलिसों में ढूँड लिया
मआल-ए-ज़िक्र-ओ-मुनाजात-ओ-हा-ओ-हू तिरा ग़म
हरम में हिर्ज़-ए-दिल-ओ-जान-ए-क़ुदसियाँ तिरा नाम
सनम-कदे में बरहमन की आरज़ू तिरा ग़म
सुकून-ए-क़ल्ब जो सोचा तो सर-बसर तिरी याद
नशात-ए-ज़ीस्त को देखा तो हू-बहू तिरा ग़म
ग़म-ए-जहाँ ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-दिगर ग़म-ए-ख़्वेश
जहान-ए-ग़म में हर इक ग़म की आबरू तिरा ग़म
हर एक रंज से गुज़रे हर इक ख़ुशी से गए
लिए फिरा जिन्हें इक उम्र कू-बकू तिरा ग़म
रही न कोई भी हसरत कि रख दिया मैं ने
हर एक जज़बा-ए-दिलकश के रू-ब-रू तिरा ग़म
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उठा न पर्दा-ए-हैरत रुख़-निहाँ से अभी
मिरे यक़ीन को फ़ुर्सत नहीं गुमाँ से अभी
मिरे यक़ीन को फ़ुर्सत नहीं गुमाँ से अभी
न खोल मुझ पे पुर-असरार ज़ुल्मतों के तिलिस्म
बहल रही है नज़र माह-ओ-कहकशाँ से अभी
सुना न ज़मज़मा-ए-रूह-काएनात मुझे
कि आ रही है सदा मेरे साज़-ए-जाँ से अभी
अभी से दे न मुझे मंज़िल-ए-अदम का सुराग़
गुज़र रहा हूँ मैं हस्ती के इम्तिहाँ से अभी
दिखा न ख़्वाब किसी आलम-ए-दिगर के मुझे
कि मेरा दिल नहीं फ़ारिग़ इसी जहाँ से अभी
न कर हक़ीक़त-ए-हस्ती से आश्ना मुझ को
कि रब्त है मुझे इस वह्म-ए-राएगाँ से अभी
बना रहा हूँ ज़मीं पर सनम-कदे अपने
सदाएँ दे न मुझे बाम-ए-आसमाँ से अभी
मक़ाम-ए-होश भी मेरी नज़र में है लेकिन
सुबू है पुर मिरा सहबा-ए-अर्ग़वाँ से अभी
भड़क रहा है अभी शो'ला-ए-नफ़स मेरा
लपक रहे हैं शरारे मिरी ज़बाँ से अभी
है ज़र्रा ज़र्रा तपाँ दश्त-ए-आरज़ू का मिरे
उठेंगे और बगूले बहुत यहाँ से अभी
फ़ना क़ुबूल हो क्यूँकर मुझे कि रिश्ता-ए-दिल
बँधा हुआ है तमन्ना-ए-जाविदाँ से अभी
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नक़्श-बर-आब थी जो दाम-ओ-दिरम ने बख़्शी
ज़ीस्त को दौलत-ए-नायाब तो ग़म ने बख़्शी
ज़ीस्त को दौलत-ए-नायाब तो ग़म ने बख़्शी
अहल-ए-दस्तार न अर्बाब-ए-करम ने बख़्शी
इज़्ज़त-ए-नफ़्स मुझे लौह-ओ-क़लम ने बख़्शी
आब्यारी न हुई आब-ए-गुहरस उस की
नख़ल-ए-इरफ़ां को नुमू दीदा-ए-नम ने बख़्शी
वर्ना क्या उन में था इक जज़्बा-ए-हैराँ के सिवा
तेरी आँखों को ये गोयाई तो हम ने बख़्शी
उम्र भर हम को मुयस्सर रही बेताबी-ए-दिल
जो ख़ुदा ने नहीं बख़्शी वो सनम ने बख़्शी
जिस ने पामर्द रखा हम को सितमगर के ख़िलाफ़
वो अज़ीमत हमें ख़ुद उस के सितम ने बख़्शी
कितनी बे-फ़ैज़ विरासत है वो तारीख़-ए-ज़ियाँ
जो हमें चपक़ुलश-ए-दैर-ओ-हरम ने बख़्शी
हर्फ़-ए-ताज़ी से भी पाया है बहुत फ़ैज़ मगर
मेरे इज़हार को लय साज़-ए-अजम ने बख़्शी
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याद है पीर-ए-मुग़ाँ की चश्म-ए-नूरानी मुझे
इक नज़र में मिल गई आलम की सुलतानी मुझे
इक नज़र में मिल गई आलम की सुलतानी मुझे
लम्हा लम्हा लुट गया सरमाया-ए-फ़ुर्सत मिरा
कर गई मुफ़्लिस इरादों की फ़रावानी मुझे
ज़ात के हुजरे में बैठा सोचता रहता हूँ मैं
ता-ब-कै आबाद रक्खेगी ये वीरानी मुझे
फ़ाश कर दूँ अहल-ए-महफ़िल पर रुमूज़-ए-हुस्न-ए-दोस्त
आगही बख़्शे अगर तौफ़ीक़-ए-नादानी मुझे
दोष पर करता हूँ इस के आलम-ए-इम्काँ की सैर
जज़्बा-ए-तख़ईल है तख़्त-ए-सुलैमानी मुझे
दिल नहीं इक ताइर-ए-वहशी है सीने में असीर
रात भर बेदार रखता है ये ज़िंदानी मुझे
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