बज़म-ए-रंग-ओ-नूर में साहिब-नज़र कोई नहीं

देखने वाले बहुत हैं दीदा-वर कोई नहीं

हम को विर्से में मिला है वो मकाँ अज्दाद से
जिस में दीवारें ही दीवारें हैं दर कोई नहीं

हर गली कूचे में अब शम्स-ओ-क़मर बिकने लगे
अब ख़रीदार-चिराग़-ए-चशम-तर कोई नहीं

यूँ तख़य्युल में हक़ाएक़ की मिलावट हो गई
अब फ़सानों में भी हर्फ़-ए-मो'तबर कोई नहीं

मैं नई मंज़िल को निकला हूँ पुरानी राह पर
मेरे हमराही बहुत हैं हम-सफ़र कोई नहीं

अहल-ए-दिल तो ख़ैर सब सूद-ओ-ज़ियाँ में पड़ गए
क्या ख़िरद-मंदों में भी आशुफ़्ता-सर कोई नहीं

— Ali Minai

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Justaju Shayari

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