तुम्हारे हिज्र की मुद्दत घटा रही हूँ मैं
घड़ी में वक़्त को उल्टा घुमा रही हूँ मैं
घड़ी में वक़्त को उल्टा घुमा रही हूँ मैं
किताब-ए-ज़िंदगी मैं ने अगर पढ़ी ही नहीं
क्यूँ इम्तिहान का परचा बना रही हूँ मैं
लगाई मैं ने किनारे पर आँसुओं की सबील
नदी की प्यास को पानी पिला रही हूँ मैं
यही कि दिल की सुनी है दिमाग़ से पहले
सज़ा उसी की मोहब्बत में पा रही हूँ मैं
सुना है और ज़ियादा सितम करेगा तू
सो अपने ज़ब्त की ताक़त बढ़ा रही हूँ मैं
लगा के एक अलग ज़ख़्म उस के पहलू में
तुम्हारे ज़ख़्म को नीचा दिखा रही हूँ मैं
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उजलत में वो देखो क्या क्या छोड़ गया
अपनी बातें अपना चेहरा छोड़ गया
अपनी बातें अपना चेहरा छोड़ गया
मुझ से एक कहानी सुनने आया था
और मुझ में वो अपना क़िस्सा छोड़ गया
ख़्वाब-ज़दा था बातें करता रहता था
रोने वालों को भी हँसता छोड़ गया
दिल के इक कोने में आहें रक्खी हैं
जाने वाला अपना हिस्सा छोड़ गया
जितनी यादें ले के हम को मरना था
उतनी साँसें दे के ज़िंदा छोड़ गया
दीवारों से लग के रो लेते होंगे
जिन को उन का साया तन्हा छोड़ गया
कमरे से जिस दिन उस की तस्वीर हटी
आईने ने देख के पूछा छोड़ गया
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ख़त्म तेरी याद का हर सिलसिला कैसे करूँ
दूर रह कर मैं तुझे ख़ुद से जुदा कैसे करूँ
दूर रह कर मैं तुझे ख़ुद से जुदा कैसे करूँ
पर समेटे ख़ुद ही बैठा है परिंदा इक तरफ़
जो क़फ़स में ही नहीं उस को रिहा कैसे करूँ
देखना और देख कर बस देखते रहना तुझे
इस तसलसुल की बता मैं इंतिहा कैसे करूँ
मुस्तक़िल दीवार से मैं ने लगा रक्खे हैं कान
इस में चुनवाई गई चुप को सदा कैसे करूँ
देखती रहती हूँ इन को सोचती रहती हूँ ये
तेरी आँखों की ज़बाँ का तर्जुमा कैसे करूँ
जा रहा है जाए वो मैं किस लिए रोकूँ उसे
ऐ मिरे दिल बे-वफ़ा को बा-वफ़ा कैसे करूँ
ऐन मुमकिन है कि मुझ को ख़ुद-कुशी करनी पड़े
वर्ना इतने सानेहों का हक़ अदा कैसे करूँ
आज़माइश की ज़रूरत हो न जिस में 'आइशा' इश्क़ में उस मरहले की इब्तिदा कैसे करूँ
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दिन गुज़रा और शाम ढली फिर वहशत ले कर आई रात
जब भी उस का हिज्र मनाया हम ने वो कहलाई रात
जब भी उस का हिज्र मनाया हम ने वो कहलाई रात
उस को रोने से पहले कुछ हम ने यूँ तय्यारी की
कोने में तन्हाई रक्खी कमरे में फैलाई रात
तू ने कैसे सोच लिया कि तेरे तोहफ़े भूल गए
दिल ने तेरे ग़म को पहना आँखों को पहनाई रात
सावन आया लेकिन सूखी एहसासों की हरियाली
बंजर दिल में आँसू बोए ऊपर से बरसाई रात
कोई भी मौसम आया हो हम पर तो बरसात हुई
उस की यादों ने जो घेरा दोपहरों पर छाई रात
उस पल जैसे बोल पड़ा हो दीवारों का सन्नाटा
उस की राहें तकते तकते जैसे हो उकताई रात
कितने ही मंज़र शामिल हैं मेरी सूनी आँखों में
चुप के से आ के करती है पलकों की तुरपाई रात
चाहत की ये रेशमी गिर्हें और पलकों पर नींद का बोझ
यादों से जो बच निकले तो ख़्वाबों ने उलझाई रात
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यूँ भी रास आई नहीं उस की वफ़ा तुम रख लो
मुझ को बीमार ही रहने दो दवा तुम रख लो
मुझ को बीमार ही रहने दो दवा तुम रख लो
बंद कमरों की घुटन मेरे लिए रहने दो
ये जो आती है दरीचों से हवा तुम रख लो
मेरी राहों में बिछा दो तुम अँधेरे सारे
और ये लो मिरे हिस्से का दिया तुम रख लो
ओढ़ कर बैठ गई हूँ मैं दुखों की चादर
ये ख़ुशी और ये ख़ुशबू-ए-क़बा तुम रख लो
मुझ को ये नूर-ए-क़मर तीरगी से हासिल है
मेरे अंदर से जो निकली है ज़िया तुम रख लो
पास बैठे कोई दिल खोल के दो बात करे
बाक़ी दुनिया के ये अतवार-ओ-अदा तुम रख लो
मेरी माँ तो मिरी जन्नत को लिए बैठी है
ऐसा कर लो मिरे पुरखों की दुआ तुम रख लो
मैं गुनहगार ही अच्छी हूँ बरा-ए-महफ़िल
ये जो तुम बेचते फिरते हो ख़ुदा तुम रख लो
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कुछ बात रह गई थी बताने के बावजूद
हूँ हालत-ए-सफ़र में घर आने के बावजूद
हूँ हालत-ए-सफ़र में घर आने के बावजूद
दिल से उतर चुका था जो आ कर गले मिला
दूरी वही थी दिल से लगाने के बावजूद
हाथों में अब भी उस की है ख़ुशबू बसी हुई
जो रह गई थी हाथ छुड़ाने के बावजूद
पुर्ज़े वो ख़त के आज भी रक्खे हैं मेरे पास
जो बच गए थे ख़त को जलाने के बावजूद
नाम उस का मेरे दिल पे छपा इस तरह से है
यूँ नक़्श है अभी भी मिटाने के बावजूद
मुझ को भी ये कमाल-ए-हुनर है मिला हुआ
मैं जी रही हूँ उस को भुलाने के बावजूद
कोई भी हम-शनास नहीं हम-नवा नहीं
रिश्तों में इक ख़ला है निभाने के बावजूद
तेरी सदाएँ आईं जो माज़ी की सम्त से
हम रुक गए हैं पाँव बढ़ाने के बावजूद
जो ज़िद में बढ़ गए थे ज़मीनों को रौंद कर
ख़ुश क्यूँ नहीं हैं आसमाँ पाने के बावजूद
ये कैसा इंतिज़ार कि होता नहीं है ख़त्म
तू आ गया मगर तिरे आने के बावजूद
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