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मोहब्बतों को कहीं और पाल कर देखो
मता-ए-जाँ को बदन से निकाल कर देखो
मता-ए-जाँ को बदन से निकाल कर देखो
बदल के देखो कभी निस्बतों की दुनिया को
बदन को रूह के ख़ाने में डाल कर देखो
सुनो उसे तो समा'अत से मावरा हो कर
जो देखना हो तो आँखें निकाल कर देखो
यक़ीन दश्त से फूटेगा आब-ए-जू की तरह
कि हर्फ़-ए-''ला'' की गवाही बहाल कर देखो
नफ़स नफ़स है यहाँ मक़बरा अक़ीदत का
ये मक़बरों का जहाँ पाएमाल कर देखो
इसी हवा में मोहब्बत का दीप जलता है
इसी जहाँ को जहान-ए-विसाल कर देखो
वो संग दे तो हरारत निचोड़ लो अपनी
जो फूल दे तो निगाह-ए-कमाल कर देखो
फिर उस के ब'अद कोई डर नहीं तलातुम का
उस एक बूँद के ग़म को विशाल कर देखो
बदन की प्यास भी इक मावरा कहानी है
हर एक बूँद को दरिया ख़याल कर देखो
पलट के आएँगे सावन के रंग आँखों में
तुम अपने-आप से रिश्ता बहाल कर देखो
वो बोलता है पहाड़ों की ओट से अक्सर
किसी पहाड़ से उस का सवाल कर देखो
ये राज़ और कहाँ तक हमें निभाना है
कभी तो रात में सूरज निकाल कर देखो
तुम अपने गौहर-ए-यकता को इस तरह ढूँडो
कि ख़ुद को बे-सर-ओ-सामाँ ख़याल कर देखो
जो देखना हो कभी दोस्तों का दिल 'अहमद'
खरे उसूल का पत्ता उछाल कर देखो
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यहाँ हर लफ़्ज़ मअ'नी से जुदा है
हक़ीक़त ज़िंदगी से मावरा है
हक़ीक़त ज़िंदगी से मावरा है
अभी चेहरे का ख़ाका बन रहा है
अभी कुछ और भी मेरे सिवा है
हमें जो कुछ मिला नाक़िस मिला है
मगर ख़ुश-फ़हमियों की इंतिहा है
कोई चेहरा नहीं ख़ुशबू का लेकिन
तमाशा फूल वालों का लगा है
मैं उस की बारिशों का मुंतज़िर हूँ
वो मुझ से मेरे आँसू माँगता है
यही बाइस है मेरी तिश्नगी का
समुंदर मुझ से पानी माँगता है
जहालत रोग था जो दिल के अंदर
वही मज़हब हमारा हो गया है
मुक़द्दस हो गया है झूट मेरा
मुझे तो अब उसी का आसरा है
मैं प्यासा हूँ पुराने मौसमों का
मगर अब वो ज़माना जा चुका है
कहानी बर्ग-ए-सोज़ाँ से इबारत
वगर्ना बहर-ओ-बर भी हाशिया है
नहीं है ख़्वाब सी तस्वीर जिस की
तो फिर उस ख़्वाब की ता'बीर क्या है
गुमाँ हंगामा-आराई का आदी
यक़ीं तन्हाइयों में बोलता है
ये दुनिया बे-ख़बर लोगों की 'अहमद'
वो दुनिया का नहीं जो जानता है
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जिस्म के बयाबाँ में दर्द की दुआ माँगे
फिर किसी मुसाफ़िर से रौशनी ज़रा माँगे
फिर किसी मुसाफ़िर से रौशनी ज़रा माँगे
खो गए किताबों में तितलियों के बाल-ओ-पर
सोच में हैं अब बच्चे क्या छुपाएँ क्या माँगे
ज़ा'फ़रानी खेतों में अब मकान उगते हैं
किस तरह ज़मीनों से दिल का राब्ता माँगे
हम भी हो गए शामिल मसनूई तिजारत में
हम कि चेहरा-सामाँ थे अब के आइना माँगे
वर्ना इल्म नामों का उठ न जाए धरती से
आदमी फले-फूले आओ ये दुआ माँगे
इस से पेशतर कि ये रात मूँद ले आँखें
नन्हे-मुन्ने जुगनू से रौशनी ज़रा माँगे
वो सदाएँ देता है आख़िरी जज़ीरे से
और हम निगाहों का हुस्न-ए-इब्तिदा माँगे
किस के सामने रखिए खोल कर रज़ा अपनी
और किस से जादू का बोलता दिया माँगे
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मैं फ़तह-ए-ज़ात मंज़र तक न पहुँचा
मिरा तेशा मिरे सर तक न पहुँचा
मिरा तेशा मिरे सर तक न पहुँचा
उसे मेमार लिक्खा बस्तियों ने
कि जो पहले ही पत्थर तक न पहुँचा
तिजारत दिल की धड़कन गिन रही है
तअल्लुक़ लुत्फ़-ए-मंज़र तक न पहुँचा
शगुफ़्ता गाल तीखे ख़त का मौसम
दोबारा नख़्ल-ए-पैकर तक न पहुँचा
बहुत छोटा सफ़र था ज़िंदगी का
मैं अपने घर के अंदर तक न पहुँचा
ये कैसा प्यास का मौसम है 'अहमद'
समुंदर दीदा-ए-तर तक न पहुँचा
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