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हाँफती नद्दी में दम टूटा हुआ था लहर का
वाक़िआ'' है ये सितंबर की किसी सह-पहर का
वाक़िआ'' है ये सितंबर की किसी सह-पहर का
सरसराहट रेंगते लम्हे की सरकण्डों में थी
था नशा सारी फ़ज़ा में नागिनों के ज़हर का
थी सदफ़ में रौशनी की बूँद थर्राई हुई
जिस्म के अंदर कहीं धड़का लगा था क़हर का
दिल में थीं ऐसे फ़साद-आमादा दिल की धड़कनें
हो भरा बलवाइयों से चौक जैसे शहर का
आसमाँ उतरा किनारों को मिलाने के लिए
ये भी फिर देखा कि पल टूटा हुआ था नहर का
ऐश-ए-बे-मीआ'द मिलती पर कहाँ मिलती तुझे
मेरी मिट्टी की महक में शाइबा है दहर का
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तमीज़-ए-पिसर-ए-ज़मीन व इब्न-ए-फ़लक न करना
तुम आदमी हो तो आदमी की हतक न करना
तुम आदमी हो तो आदमी की हतक न करना
ये जम्अ''-ओ-तफ़रीक़ ज़र्ब-ओ-तक़सीम की सदी है
अक़ीदा ठहरा अदद की मंतिक़ पे शक न करना
पस-ए-ख़राबात-ए-बंद जारी है मय-गुसारी
सिखाया जाम-ओ-सुबू को हम ने खनक न करना
छलावे बन जाएँ आगे जा कर यही ग़ज़ालाँ
तआ'क़ुब इन मह-वशों का तुम दूर तक न करना
ये ग़म के मा'नी तुझे लगे है सराब-ए-मा'नी
अकेले सहना उसे ग़म-ए-मुश्तरक न करना
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वो अपने जुज़्व में खोया गया है इस हद तक
कि उस की फ़हम से बाहर है कल की अबजद तक
कि उस की फ़हम से बाहर है कल की अबजद तक
खड़ी हैं रौशनियाँ दस्त-बस्ता सदियों से
हिरा के ग़ार से ले कर गया के बरगद तक
उठे तो उस के फ़ुसूँ से लहक लहक जाए
नज़र पहुँच न सके उस की क़ामत-ओ-क़द तक
पता चला कि हरारत नहीं रही दिल में
गुज़र के आग से आए थे अपने मक़्सद तक
वही असास बना उम्र के हिसाबों की
पहाड़ा याद किया था जो एक से सद तक
वही जो दोश पर अपने उठा सका ख़ुद को
नशेब-ए-फ़र्श से पहुँचा फ़राज़-ए-मसनद तक
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इक फ़ना के घाट उतरा एक पागल हो गया
या'नी मंसूबा ज़माने का मुकम्मल हो गया
या'नी मंसूबा ज़माने का मुकम्मल हो गया
जिस्म के बर्फ़ाब में आँखें चमकती हैं अभी
कौन कहता है कि उस का हौसला शल हो गया
ज़ेहन पर बे-सम्तियों की बारिशें इतनी हुईं
ये इलाक़ा तो घने रस्तों का जंगल हो गया
इस कलीद-ए-इस्म-ए-ना-मा'लूम से कैसे खुले
दिल का दरवाज़ा कि अंदर से मुक़फ़्फ़ल हो गया
शो'ला-ज़ार-ए-गुल से गुज़रे तो सर-ए-आग़ाज़ ही
इक शरर आँखों से उतरा ख़ून में हल हो गया
शहर-ए-आइंदा का दरिया है गिरफ़्त-ए-रेग में
बस कि जो होना है उस का फ़ैसला कल हो गया
मौसम-ए-ताख़ीर-ए-गुल आता है किस के नाम पर
कौन है जिस का लहू इस ख़ाक में हल हो गया
इस क़दर ख़्वाबों को मसला पा-ए-आहन-पोश ने
शौक़ का आईन बिल-आख़िर मोअ'त्तल हो गया
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