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Aftab Iqbal Shamim

Top 10 of Aftab Iqbal Shamim

Aftab Iqbal Shamim

Top 10 of Aftab Iqbal Shamim

    ये जो ठहरा हुआ मंज़र है बदलता ही नहीं
    वाक़िआ''' पर्दा-ए-साअ'त से निकलता ही नहीं

    आग से तेज़ कोई चीज़ कहाँ से लाऊँ
    मोम से नर्म है वो और पिघलता ही नहीं

    ये मिरी ख़म्स-हवा सेी की तमाशा-गाहें
    तंग हैं उन में मिरा शौक़ बहलता ही नहीं

    पैकर-ए-ख़ाक हैं और ख़ाक में है सक़्ल बहुत
    जिस्म का वज़्न तलब हम से सँभलता ही नहीं

    ग़ालिबन वक़्त मुझे छोड़ गया है पीछे
    ये जो सिक्का है मिरी जेब में चलता ही नहीं

    हम पे ग़ज़लें भी नमाज़ों की तरह फ़र्ज़ हुईं
    क़र्ज़ ना-ख़्वास्ता ऐसा है कि टलता ही नहीं
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    Aftab Iqbal Shamim
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    हाँफती नद्दी में दम टूटा हुआ था लहर का
    वाक़िआ'' है ये सितंबर की किसी सह-पहर का

    सरसराहट रेंगते लम्हे की सरकण्डों में थी
    था नशा सारी फ़ज़ा में नागिनों के ज़हर का

    थी सदफ़ में रौशनी की बूँद थर्राई हुई
    जिस्म के अंदर कहीं धड़का लगा था क़हर का

    दिल में थीं ऐसे फ़साद-आमादा दिल की धड़कनें
    हो भरा बलवाइयों से चौक जैसे शहर का

    आसमाँ उतरा किनारों को मिलाने के लिए
    ये भी फिर देखा कि पल टूटा हुआ था नहर का

    ऐश-ए-बे-मीआ'द मिलती पर कहाँ मिलती तुझे
    मेरी मिट्टी की महक में शाइबा है दहर का
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    Aftab Iqbal Shamim
    9
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    दिखाई जाएगी शहर-ए-शब में सहर की तमसील चल के देखें
    सर-ए-सलीब ईस्तादा होगा ख़ुदा-ए-इंजील चल के देखें

    गुलों ने बंद-ए-क़बा है खोला, हवा से बू-ए-जुनूँ भी आए
    करेंगे इस मौसम-ए-वफ़ा में हम अपनी तकमील चल के देखें

    ग़नीम-ए-शब के ख़िलाफ़ अब के ज़ियाँ हुई ग़ैब की गवाही
    पड़ा हुआ ख़ाक पर शिकस्ता पर-ए-अबाबील चल के देखें

    चुने हैं वो रेज़ा रेज़ा मंज़र, लहू लहू हो गई हैं आँखें
    चलो ना! उस दुख के रास्ते पर सफ़र की तफ़्सील चल के देखें

    फ़ज़ा में उड़ता हुआ कहीं से अजब नहीं अक्स-ए-बर्ग आए
    ख़िज़ाँ के बे-रंग आसमाँ से अटी हुई झील चल के देखें

    लुढ़क गया शब का कोह-पैमा ज़मीं की हमवारियों की जानिब
    कहीं हवा गुल न कर चुकी हो अना की क़िंदील चल के देखें
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    Aftab Iqbal Shamim
    8
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    तमीज़-ए-पिसर-ए-ज़मीन व इब्न-ए-फ़लक न करना
    तुम आदमी हो तो आदमी की हतक न करना

    ये जम्अ''-ओ-तफ़रीक़ ज़र्ब-ओ-तक़सीम की सदी है
    अक़ीदा ठहरा अदद की मंतिक़ पे शक न करना

    पस-ए-ख़राबात-ए-बंद जारी है मय-गुसारी
    सिखाया जाम-ओ-सुबू को हम ने खनक न करना

    छलावे बन जाएँ आगे जा कर यही ग़ज़ालाँ
    तआ'क़ुब इन मह-वशों का तुम दूर तक न करना

    ये ग़म के मा'नी तुझे लगे है सराब-ए-मा'नी
    अकेले सहना उसे ग़म-ए-मुश्तरक न करना
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    Aftab Iqbal Shamim
    7
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    पंजों के बल खड़े हुए शब की चटान पर
    नाख़ुन से इक ख़राश लगा आसमान पर

    बरसों दरून-ए-सीना सुलगना है फिर हमें
    लगता है क़ुफ़्ल-ए-हब्स हवा के मकान पर

    इक धाड़ है कि चारों तरफ़ से सुनाई दे
    गिर्दाब-ए-चश्म बन गईं आँखें मचान पर

    मौजूद भी कहीं न कहीं इल्तवा में है
    जो है निशान पर वो नहीं है निशान पर

    उस में कमाल उस की ख़बर-साज़ियों का है
    खाता हूँ मैं फ़रेब जो सच के गुमान पर

    सरकश को निस्फ़ उम्र का हो लेने दीजिए
    बिक जाएगा किसी न किसी की दुकान पर
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    Aftab Iqbal Shamim
    6
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    वो अपने जुज़्व में खोया गया है इस हद तक
    कि उस की फ़हम से बाहर है कल की अबजद तक

    खड़ी हैं रौशनियाँ दस्त-बस्ता सदियों से
    हिरा के ग़ार से ले कर गया के बरगद तक

    उठे तो उस के फ़ुसूँ से लहक लहक जाए
    नज़र पहुँच न सके उस की क़ामत-ओ-क़द तक

    पता चला कि हरारत नहीं रही दिल में
    गुज़र के आग से आए थे अपने मक़्सद तक

    वही असास बना उम्र के हिसाबों की
    पहाड़ा याद किया था जो एक से सद तक

    वही जो दोश पर अपने उठा सका ख़ुद को
    नशेब-ए-फ़र्श से पहुँचा फ़राज़-ए-मसनद तक
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    Aftab Iqbal Shamim
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    इक फ़ना के घाट उतरा एक पागल हो गया
    या'नी मंसूबा ज़माने का मुकम्मल हो गया

    जिस्म के बर्फ़ाब में आँखें चमकती हैं अभी
    कौन कहता है कि उस का हौसला शल हो गया

    ज़ेहन पर बे-सम्तियों की बारिशें इतनी हुईं
    ये इलाक़ा तो घने रस्तों का जंगल हो गया

    इस कलीद-ए-इस्म-ए-ना-मा'लूम से कैसे खुले
    दिल का दरवाज़ा कि अंदर से मुक़फ़्फ़ल हो गया

    शो'ला-ज़ार-ए-गुल से गुज़रे तो सर-ए-आग़ाज़ ही
    इक शरर आँखों से उतरा ख़ून में हल हो गया

    शहर-ए-आइंदा का दरिया है गिरफ़्त-ए-रेग में
    बस कि जो होना है उस का फ़ैसला कल हो गया

    मौसम-ए-ताख़ीर-ए-गुल आता है किस के नाम पर
    कौन है जिस का लहू इस ख़ाक में हल हो गया

    इस क़दर ख़्वाबों को मसला पा-ए-आहन-पोश ने
    शौक़ का आईन बिल-आख़िर मोअ'त्तल हो गया
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    Aftab Iqbal Shamim
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    कभी ख़ुद को दर्द-शनास करो कभी आओ ना
    मुझे इतना तो न उदास करो कभी आओ ना

    मिरी उम्र-सराए महके है गुल-ए-हिज्राँ से
    कभी आओ आ कर बास करो कभी आओ ना

    मुझे चाँद में शक्ल दिखाई दे जो दुहाई दे
    कोई चारा-ए-होश-ओ-हवा से करो कभी आओ ना

    इसी गोशा-ए-याद में बैठा हूँ कई बरसों से
    किसी रफ़्त-गुज़श्त का पास करो कभी आओ ना

    कहीं आब-ओ-हवा-ए-तिश्ना-लबी मुझे मार न दे
    उसे बरखा बन कर रास करो कभी आओ ना

    सदा आते जाते मौसम की ये गुलाब-रुतें
    कोई देर हैं ये एहसास करो कभी आओ ना
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    Aftab Iqbal Shamim
    3
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    अपनी कैफ़िय्यतें हर आन बदलती हुई शाम
    मुंजमिद होती हुई और पिघलती हुई शाम

    डगमगाती हुई हर-गाम सँभलती हुई शाम
    ख़्वाब-गाहों से उधर ख़्वाब में चलती हुई शाम

    गूँध कर मोतिए के हार घनी ज़ुल्फ़ों में
    आरिज़-ओ-लब पे शफ़क़ सुर्ख़ियाँ मलती हुई शाम

    इक झलक पोशिश-ए-बे-ज़ब्त से उर्यानी की
    दे गई दिन के नशेबों से फिसलती हुई शाम

    एक सन्नाटा रग-ओ-पय में सदा गूँजता है
    बुझ गई जैसे लहू में कोई जलती हुई शाम

    वक़्त बपतिस्मा करे आब-ए-सितारा से उसे
    दस्त-ए-दुनिया की दराज़ी से निकलती हुई शाम
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    Aftab Iqbal Shamim
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    नज़र के सामने रहना नज़र नहीं आना
    तिरे सिवा ये किसी को हुनर नहीं आना

    ये इंतिज़ार मगर इख़्तियार में भी नहीं
    पता तो है कि उसे उम्र भर नहीं आना

    ये हिजरतें हैं ज़मीन ओ ज़माँ से आगे की
    जो जा चुका है उसे लौट कर नहीं आना

    ज़रा सी ग़ैब की लुक्नत ज़बान में लाओ
    बग़ैर इस के सुख़न में असर नहीं आना

    हर आने वाला नया रास्ता दिखाता है
    इसी लिए तो हमें राह पर नहीं आना

    ज़रा वो दूसरी खिड़की भी खोल कमरे की
    नहीं तो ताज़ा हवा ने इधर नहीं आना

    करूँ मसाफ़तें ना-आफ़्रीदा राहों की
    मुझ ऐसा बा'द में आवारा-सर नहीं आना
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    Aftab Iqbal Shamim
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Gulzar DehlviGulzar DehlviAbrar KashifAbrar KashifKaifi AzmiKaifi AzmiQabil AjmeriQabil AjmeriVikram Gaur VairagiVikram Gaur VairagiAmeer MinaiAmeer MinaiAsrar Ul Haq MajazAsrar Ul Haq MajazTaimur HasanTaimur HasanShakeel BadayuniShakeel BadayuniAhmad MushtaqAhmad Mushtaq