पंजों के बल खड़े हुए शब की चटान पर

नाख़ुन से इक ख़राश लगा आसमान पर

बरसों दरून-ए-सीना सुलगना है फिर हमें
लगता है क़ुफ़्ल-ए-हब्स हवा के मकान पर

इक धाड़ है कि चारों तरफ़ से सुनाई दे
गिर्दाब-ए-चश्म बन गईं आँखें मचान पर

मौजूद भी कहीं न कहीं इल्तवा में है
जो है निशान पर वो नहीं है निशान पर

उस में कमाल उस की ख़बर-साज़ियों का है
खाता हूँ मैं फ़रेब जो सच के गुमान पर

सरकश को निस्फ़ उम्र का हो लेने दीजिए
बिक जाएगा किसी न किसी की दुकान पर

— Aftab Iqbal Shamim

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