Ahmad Mushtaq

Top 10 of Ahmad Mushtaq

    अब मंज़िल-ए-सदा से सफ़र कर रहे हैं हम
    या'नी दिल-ए-सुकूत में घर कर रहे हैं हम

    खोया है कुछ ज़रूर जो उस की तलाश में
    हर चीज़ को इधर से उधर कर रहे हैं हम

    गोया ज़मीन कम थी तग-ओ-ताज़ के लिए
    पैमाइश-ए-नुजूम-ओ-क़मर कर रहे हैं हम

    काफ़ी न था जमाल-ए-रुख़-ए-सादा-ए-बहार
    ज़ेबाइश-ए-गियाह-ओ-शजर कर रहे हैं हम

    Ahmad Mushtaq
    0 Likes

    पानी में अक्स और किसी आसमाँ का है
    ये नाव कौन सी है ये दरिया कहाँ का है

    दीवार पर खिले हैं नए मौसमों के फूल
    साया ज़मीन पर किसी पिछले मकाँ का है

    चारों तरफ़ हैं सब्ज़ सलाख़ें बहार की
    जिन में घिरा हुआ कोई मौसम ख़िज़ाँ का है

    सब कुछ बदल गया है तह-ए-आसमाँ मगर
    बादल वही हैं रंग वही आसमाँ का है

    दिल में ख़्याल-ए-शहर-ए-तमन्ना था जिस जगह
    वाँ अब मलाल इक सफ़र-ए-राएगाँ का है

    Ahmad Mushtaq
    1 Like

    ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना
    ये अलग बात कि मुमकिन नहीं ऐसा होना

    देखता और न ठहरता तो कोई बात भी थी
    जिस ने देखा ही नहीं उस से ख़फ़ा क्या होना

    तुझ से दूरी में भी ख़ुश रहता हूँ पहले की तरह
    बस किसी वक़्त बुरा लगता है तन्हा होना

    यूँ मेरी याद में महफ़ूज़ हैं तेरे ख़द-ओ-ख़ाल
    जिस तरह दिल में किसी शय की तमन्ना होना

    ज़िंदगी मारका-ए-रूह-ओ-बदन है 'मुश्ताक़'
    इश्क़ के साथ ज़रूरी है हवस का होना

    Ahmad Mushtaq
    0 Likes

    ये कहना तो नहीं काफ़ी कि बस प्यारे लगे हम को
    उन्हें कैसे बताएँ हम कि वो कैसे लगे हम को

    मकीं थे या किसी खोई हुई जन्नत की तस्वीरें
    मकाँ इस शहर के भूले हुए सपने लगे हम को

    हम उन को सोच में गुम देख कर वापस चले आए
    वो अपने ध्यान में बैठे हुए अच्छे लगे हम को

    बहुत शफ़्फ़ाफ़ थे जब तक कि मसरूफ़-ए-तमन्ना थे
    मगर इस कार-ए-दुनिया में बड़े धब्बे लगे हम को

    जहाँ तन्हा हुए दिल में भँवर से पड़ने लगते हैं
    अगरचे मुद्दतें गुज़रीं किनारे से लगे हम को

    Ahmad Mushtaq
    0 Likes

    अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं
    कौन रहता था कहाँ याद नहीं

    जल्वा-ए-हुस्न-ए-अज़ल थे वो दयार
    जिन के अब नाम-ओ-निशाँ याद नहीं

    कोई उजला सा भला सा घर था
    किस को देखा था वहाँ याद नहीं

    याद है ज़ीना-ए-पेचाँ उस का
    दर-ओ-दीवार-ए-मकाँ याद नहीं

    याद है ज़मज़मा-ए-साज़-ए-बहार
    शोर-ए-आवाज़-ए-ख़िज़ाँ याद नहीं

    Ahmad Mushtaq
    1 Like

    पता अब तक नहीं बदला हमारा
    वही घर है वही क़िस्सा हमारा

    वही टूटी हुई कश्ती है अपनी
    वही ठहरा हुआ दरिया हमारा

    ये मक़्तल भी है और कुंज-ए-अमाँ भी
    ये दिल ये बे-निशाँ कमरा हमारा

    किसी जानिब नहीं खुलते दरीचे
    कहीं जाता नहीं रस्ता हमारा

    हम अपनी धूप में बैठे हैं 'मुश्ताक़'
    हमारे साथ है साया हमारा

    Ahmad Mushtaq
    0 Likes

    मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है
    वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है

    जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे
    ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है

    इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे
    और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है

    रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए
    इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है

    दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन
    उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है

    Ahmad Mushtaq
    11 Likes

    नए दीवानों को देखें तो ख़ुशी होती है
    हम भी ऐसे ही थे जब आए थे वीराने में

    Ahmad Mushtaq
    42 Likes

    हम अपनी धूप में बैठे हैं 'मुश्ताक़'
    हमारे साथ है साया हमारा

    Ahmad Mushtaq
    24 Likes

    ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे
    रंग-ए-गुल और बू-ए-गुल दोनों हवा हो जाएँगे

    आँख से आँसू निकल जाएँगे और टहनी से फूल
    वक़्त बदलेगा तो सब क़ैदी रिहा हो जाएँगे

    फूल से ख़ुश्बू बिछड़ जाएगी सूरज से किरन
    साल से दिन वक़्त से लम्हे जुदा हो जाएँगे

    कितने पुर-उम्मीद कितने ख़ूबसूरत हैं ये लोग
    क्या ये सब बाज़ू ये सब चेहरे फ़ना हो जाएँगे

    Ahmad Mushtaq
    2 Likes

Top 10 of Similar Writers