अब मंज़िल-ए-सदा से सफ़र कर रहे हैं हम
या'नी दिल-ए-सुकूत में घर कर रहे हैं हम
खोया है कुछ ज़रूर जो उस की तलाश में
हर चीज़ को इधर से उधर कर रहे हैं हम
गोया ज़मीन कम थी तग-ओ-ताज़ के लिए
पैमाइश-ए-नुजूम-ओ-क़मर कर रहे हैं हम
काफ़ी न था जमाल-ए-रुख़-ए-सादा-ए-बहार
ज़ेबाइश-ए-गियाह-ओ-शजर कर रहे हैं हम
पानी में अक्स और किसी आसमाँ का है
ये नाव कौन सी है ये दरिया कहाँ का है
दीवार पर खिले हैं नए मौसमों के फूल
साया ज़मीन पर किसी पिछले मकाँ का है
चारों तरफ़ हैं सब्ज़ सलाख़ें बहार की
जिन में घिरा हुआ कोई मौसम ख़िज़ाँ का है
सब कुछ बदल गया है तह-ए-आसमाँ मगर
बादल वही हैं रंग वही आसमाँ का है
दिल में ख़्याल-ए-शहर-ए-तमन्ना था जिस जगह
वाँ अब मलाल इक सफ़र-ए-राएगाँ का है
ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना
ये अलग बात कि मुमकिन नहीं ऐसा होना
देखता और न ठहरता तो कोई बात भी थी
जिस ने देखा ही नहीं उस से ख़फ़ा क्या होना
तुझ से दूरी में भी ख़ुश रहता हूँ पहले की तरह
बस किसी वक़्त बुरा लगता है तन्हा होना
यूँ मेरी याद में महफ़ूज़ हैं तेरे ख़द-ओ-ख़ाल
जिस तरह दिल में किसी शय की तमन्ना होना
ज़िंदगी मारका-ए-रूह-ओ-बदन है 'मुश्ताक़'
इश्क़ के साथ ज़रूरी है हवस का होना
ये कहना तो नहीं काफ़ी कि बस प्यारे लगे हम को
उन्हें कैसे बताएँ हम कि वो कैसे लगे हम को
मकीं थे या किसी खोई हुई जन्नत की तस्वीरें
मकाँ इस शहर के भूले हुए सपने लगे हम को
हम उन को सोच में गुम देख कर वापस चले आए
वो अपने ध्यान में बैठे हुए अच्छे लगे हम को
बहुत शफ़्फ़ाफ़ थे जब तक कि मसरूफ़-ए-तमन्ना थे
मगर इस कार-ए-दुनिया में बड़े धब्बे लगे हम को
जहाँ तन्हा हुए दिल में भँवर से पड़ने लगते हैं
अगरचे मुद्दतें गुज़रीं किनारे से लगे हम को
अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं
कौन रहता था कहाँ याद नहीं
जल्वा-ए-हुस्न-ए-अज़ल थे वो दयार
जिन के अब नाम-ओ-निशाँ याद नहीं
कोई उजला सा भला सा घर था
किस को देखा था वहाँ याद नहीं
याद है ज़ीना-ए-पेचाँ उस का
दर-ओ-दीवार-ए-मकाँ याद नहीं
याद है ज़मज़मा-ए-साज़-ए-बहार
शोर-ए-आवाज़-ए-ख़िज़ाँ याद नहीं
पता अब तक नहीं बदला हमारा
वही घर है वही क़िस्सा हमारा
वही टूटी हुई कश्ती है अपनी
वही ठहरा हुआ दरिया हमारा
ये मक़्तल भी है और कुंज-ए-अमाँ भी
ये दिल ये बे-निशाँ कमरा हमारा
किसी जानिब नहीं खुलते दरीचे
कहीं जाता नहीं रस्ता हमारा
हम अपनी धूप में बैठे हैं 'मुश्ताक़'
हमारे साथ है साया हमारा
मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है
वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है
जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे
ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है
इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे
और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है
रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए
इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है
दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन
उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है
ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे
रंग-ए-गुल और बू-ए-गुल दोनों हवा हो जाएँगे
आँख से आँसू निकल जाएँगे और टहनी से फूल
वक़्त बदलेगा तो सब क़ैदी रिहा हो जाएँगे
फूल से ख़ुश्बू बिछड़ जाएगी सूरज से किरन
साल से दिन वक़्त से लम्हे जुदा हो जाएँगे
कितने पुर-उम्मीद कितने ख़ूबसूरत हैं ये लोग
क्या ये सब बाज़ू ये सब चेहरे फ़ना हो जाएँगे