जब ज़ीस्त में फिसल गए
अपने सभी बदल गए
बनकर हकीम आए जो
ज़ख़्मों को और मसल गए
मारा सभी ने पहले तो
आख़िर में फिर कुचल गए
कर चीख़ अनसुनी मेरी
चुपके से सब निकल गए
क़िस्सा मनीष सुन यहाँ
सब मुर्दे तक दहल गए
— Manish Kumar Gupta
अपने सभी बदल गए
बनकर हकीम आए जो
ज़ख़्मों को और मसल गए
मारा सभी ने पहले तो
आख़िर में फिर कुचल गए
कर चीख़ अनसुनी मेरी
चुपके से सब निकल गए
क़िस्सा मनीष सुन यहाँ
सब मुर्दे तक दहल गए
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