कहीं शुनवाई नहीं हुस्न की महफ़िल के ख़िलाफ़

गुल न क्यूँ हँसते रहें शोर-ए-अनादिल के ख़िलाफ़

जान-ओ-ईमाँ भी वही दुश्मन-ए-जान-ओ-ईमाँ
हम गवाही भी न देंगे कहीं क़ातिल के ख़िलाफ़

किसी जादे पे चलो छोड़ेगी तन्हाई न साथ
क़दम उट्ठें तो किधर इश्क़ की मंज़िल के ख़िलाफ़

बज़्म-ए-याराँ हो कि मय नग़्मा के फ़ैज़ान-ए-सुख़न
सब हैं साज़िश में शरीक उस की मिरे दिल के ख़िलाफ़

हिज्र में जी के बहलने के थे जितने हीले
वहशत इक साथ रही हो गए सब मिल के ख़िलाफ़

इसी आग़ोश में दम तोड़ेंगी आ कर मौजें
भागती फिरती हैं बेकार ही साहिल के ख़िलाफ़

अक़्ल-ए-दुनिया का तुम्हें दा'वा है बे-वज्ह 'वहीद'
दो-क़दम चल नहीं सकते कभी तुम दिल के ख़िलाफ़

— Waheed Akhtar

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