हम को मंज़ूर तुम्हारा जो न पर्दा होता

सारा इल्ज़ाम सर अपने ही न आया होता

दोस्त-अहबाब भी बे-गाने नज़र आते हैं
काश इक शख़्स को इतना भी न चाहा होता

मुफ़्त माँगा था किसी ने सो उसे बख़्श दिया
ऐसा सस्ता भी न था दिल जिसे बेचा होता

जान कर हम ने किया ख़ुद को ख़राब-ओ-रुसवा
वर्ना हम वो थे फ़रिश्तों ने भी पूजा होता

अहल-ए-दुनिया को बहुत हम से भी उम्मीदें थीं
ज़िंदगी तुझ से मगर अपना न झगड़ा होता

नासेहो हम को भी अंजाम-ए-जुनूँ है मालूम
उस को समझाओ जो ये सब न समझता होता

वो ख़िरद-मंद वो बाहोश 'वहीद' आज कहाँ
मिलने वालों से कभी तुम ने ये पूछा होता

— Waheed Akhtar

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