तूदा-ए-ख़ाक-ए-बदन आब-ए-रवाँ ख़ूब हुआ
अब के बरसात में मिट्टी का ज़ियाँ ख़ूब हुआ
ऐसा महसूस हुआ तू नहीं राज़ी मुझ से
बे-यक़ीनी का मुझे तुझ पे गुमाँ ख़ूब हुआ
ख़ुश्बू-ए-इश्क़ उड़ी ले के परों पर तितली
जिस को चाहा था छुपाना वो अयाँ ख़ूब हुआ
कोई जलता हुआ मंज़र तो नहीं था लेकिन
हाँ मगर रात सुना है कि धुआँ ख़ूब हुआ
एक सूरज ने मिरे जिस्म पे किरनें रख दीं
आज रौशन मिरा तारीक मकाँ ख़ूब हुआ
— Wafa Naqvi















