शाम ढले मैं घर रौशन भी करता था

कितना कुछ तो मैं बेमन भी करता था

दुनिया मुझ से सिर्फ़ मोहब्बत करती है
वो दीवाना पागलपन भी करता था

तुम जो कहते थे ना इक दिन छू लोगे
छू लेते ना मेरा मन भी करता था

मेरे सिरहाने वो घुँघरू गुम-सुम है
उस के पैरों में छनछन भी करता था

उस के हाथों में बस हम ही जँचते थे
दावा सोने का कंगन भी करता था

— Vishal Bagh

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