सुख़न का मसअला लफ़्ज़-ए-किताब तक नहीं है
ये कुल्लियात मेरा इंतिख़ाब तक नहीं है
गँवा के उम्र उठा हूँ तुम्हारी नींद से मैं
मलाल आँख में ऐसा है ख़्वाब तक नहीं है
ब-ज़ो'म-ए-सीना-ए-ख़ाली मिलेंगे अब उस से
कि देख ले तो कहे इज़्तिराब तक नहीं है
वो चश्म-ए-क़र्ज़-फ़रोश आ रही है सो मैं भी
लुटा रहा हूँ कि जो दस्तयाब तक नहीं है
ख़ुदा करे कि तेरे पाँव से उठें ही नहीं
पर अब तो हाथ उठाने की ताब तक नहीं है
— Vipul Kumar















