सवाद-ए-शाम में सब वहशियों का जलसा हो

लहू का राग हो और नग़मा-साज़ प्यासा हो

सुना रहे हैं मुझे लोग दास्ताँ उस की
इस एतिमाद से जैसे किसी ने देखा हो

किसी के होंट सुरों में कलाम करते हों
किसी का रंज उदासी की तान लेता हो

किसी कनार की ख़ुशबू से शे'र खुलने लगें
कि बात बात नहीं हो बस इक इशारा हो

बला-ए-सर्द कोई शाल हो सितारों जड़ा
ख़िज़ाँ की शाम हो और सर्दियों का क़िस्सा हो

गिला न कर कि गिला मातम-ए-मोहब्बत है
गले से लग के बता मुझ से जो भी शिकवा हो

अब आ गए हैं कि आख़िर तेरी गली का भरम
कहीं किवाड़ की दस्तक ही से न खुलता हो

मैं ये समझ के रग-ए-गुल से बात करता हूँ
कोई तो बाग़ में मेरा हिसाब लिखता हो

— Vipul Kumar

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