पिघलते जिस्मों की रौशनी से डरा हुआ हूँ
मैं छू रहा हूँ जिसे उसी से डरा हुआ हूँ
मुझे उसी एक दुख की लत है उसी को लाओ
मैं ताज़ा ज़ख़्मों की ताज़गी से डरा हुआ हूँ
मैं अपने अंदर के शोर से ख़ौफ़ खाने वाला
अब अपने अंदर की ख़ामुशी से डरा हुआ हूँ
मैं किस तरह इक सादा दिल को फ़रेब दूँगा
मैं उस की आँखों की सादगी से डरा हुआ हूँ
— Vipul Kumar















