उस के दिल में भी ज़रा सी छटपटाहट छोड़ दें

जाते जाते उस के दर पर अपनी आहट छोड़ दें

जाम-ए-साक़ी मय-कदे सब छोड़ तो आए मगर
ये नहीं मुमकिन हम अपनी लड़खड़ाहट छोड़ दें

क्या करेंगे हम क़फ़स को छोड़ कर ज़ेर-ए-फ़लक
शर्त जब ये है कि अपनी फड़फड़ाहट छोड़ दें

छोड़ने को छोड़ देंगे ज़िंदगी भी शौक़ से
वो किसी दिन बस ज़रा जो हिचकिचाहट छोड़ दें

काम आएँगे यही बोसे उदासी के ख़िलाफ़
एक दूजे के लबों पर मुस्कुराहट छोड़ दें

उस से मिलने जा रहे हैं ठीक से तय्यार हों
ये न हो जल्दी में अपनी हड़बड़ाहट छोड़ दें

'आश्ना' हो जाएगा मौसम गुलाबी शहर का
हम तिरे आने की बस जो सुगबुगाहट छोड़ दें

— Vineet Aashna

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Udasi Shayari

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