ये शाहज़ादी की एक अदा है कमी नहीं है
वो बोलने जब लगे तो फिर सोचती नहीं है
कोई जो पूछे ख़मोश क्यूँ हो तो हम बताएँ
हमारी नाराज़गी है ये ख़ामुशी नहीं है
ख़ला का चेहरा मुसव्विरों ने परख लिया है
पर उस की तस्वीर इनसे अब तक बनी नहीं है
कल उस की आँखों में फिर से आँसू थे मुझ को ले कर
तो आग अब तक दहक रही है बुझी नहीं है
मुझी को महफ़िल में ढूँढ़ने वो हुआ था दाख़िल
मुझी पे उस की निगाह अब तक पड़ी नहीं है
— Vikram Gaur Vairagi















