चेहरा धुँदला सा था और सुनहरे झुमके थे
बादल ने कानों में चाँद के टुकड़े पहने थे
इक दूजे को खोने से हम इतना डरते थे
ग़ुस्सा भी होते तो बातें करते रहते थे
मैं तो सजदे में था देखने वाले कहते हैं
क़ातिल की तलवार से पहले आँसू निकले थे
— Vikram Gaur Vairagi















