सोचना भी अजीब आदत है
ये भी तो सोचने की सूरत है
अब मुझे आप छोड़ जाइएगा
अब मुझे आप की ज़रूरत है
मेरी सिगरेट पे ए'तिराज़ तो हैं
क्या मुझे चूमने की हसरत है
बस अपने आप में उलझा हुआ है
उसे कह दो कि शे'र अच्छा हुआ है
समुंदर की चटाई खींच लो अब
बहुत दिन से यहीं बैठा हुआ है
बुना था तुम ने पिछली सर्दियों में
ये मैं ने हिज्र जो पहना हुआ है
— Vikas Rana















