तमाम रेत पे बिखरा है तन उदासी का

वो लहर है या कोई पैरहन उदासी का

है इक दरीचा जहाँ से वो देखती है अतीत
सो लग गया मेरे कमरे में मन उदासी का

मैं उस की छाँव में बैठूँ तो जिस्म जलता है
मेरे शजर पे लगा है गहन उदासी का

हमारे इश्क़ को क़ुदरत ने जान बख़्शी है
तुम इक सुकूत हो और मैं हूँ बन उदासी का

तुम्हारे हिज्र में इक मौत और उस के बा'द
हमारी रूह ने पकड़ा बदन उदासी का

— Vijay Sharma

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