हम को मुश्किल में रहने दे चारा-गर
आसानी से मर जाऍंगे समझा कर
अव्वल अव्वल हम भी तेरे जैसे थे
हम भी ख़ुश होते थे देख के ख़ुश मंज़र
नक़्ल-मकानी शौक़ नहीं मजबूरी थी
मैं घर से न चलता कैसे चलता घर
उन को बस तन्क़ीद ही करनी होती है
उन को क्या मालूम ग़ज़ल के पस मंज़र
— Vashu Pandey















