वफ़ा, ख़ुलूस, मदद, देखभाल भूल गए
अब ऐसे लफ़्ज़ों का सब इस्तिमाल भूल गए
मनाना रूठना हिज्र-ओ-विसाल भूल गए
सभी मोहब्बतों का इस्तिमाल भूल गए
नज़र के सामने वो बा-कमाल क्या आया
हम अपने हिस्से के सारे कमाल भूल गए
क़फ़स में लग गया जी आख़िरश परिंदों का
जहाँ से आए थे वो डाल-वाल भूल गए
फ़ुतूर फिर से चढ़ा है नई मुहब्बत का
जनाब पिछली मुहब्बत का हाल भूल गए?
फिर उस ने सोच समझ कर इक ऐसी चाल चली
कि जिस को देख के सब अपनी चाल भूल गए
दिए जलाने थे पर दिल जला दिए हम ने
हम अपने फ़न का सही इस्तिमाल भूल गए
— Varun Anand















