तिरे चेहरे की रौनक़ खा रहा है
ये किस का ग़म तुझे तड़पा रहा है।
हमारा सब्र तो पूरा रहा था
हमारा फल मगर फीका रहा है
मैं उस का सातवाँ हूँ इश्क़ तो क्या
वो मेरा कौन सा पहला रहा है।
तिरा दुख है तो क्या हैं रोज़ के दुख
नए पौदों को बरगद खा रहा है।
बिछड़ने में मज़ा भी था सज़ा भी
मैं अब ख़ुश हूँ तो वो पछता रहा है
हमारे दरमियाँ उलफ़त नहीं है
हमारे बीच समझौता रहा है
अजाइब घर में रक्खी जाएँगी सब
वो जिस-जिस चीज़ को छूता रहा है
खड़ी है शाम फिर बाहें पसारे
कोई भूला सहर का आ रहा है
— Varun Anand















