इसीलिए तो मुसाफ़िर तू सोगवार नहीं

कि तू ने क़ाफ़िले देखे हैं पर गुबार नहीं

नहीं ये बात नहीं है कि तुझ से प्यार नहीं
मैं क्या करूँ कि मुझे ख़ुद का ए'तिबार नहीं

लगा हूँ हाथ जो तेरे तो अब सँभाल मुझे
मैं एक बार ही मिलता हूँ बार-बार नहीं

मुझे कुरेदने वालो मैं एक सहरा हूँ
कि मुझ से रेत ही निकलेगी आबशार नहीं

ग़मों से रिश्ता बना दोस्ती निभा इनसे
दुखों को पाल मेरी जान इनको मार नहीं

मिरे क़ुबूल पे उस ने क़ुबूल कह तो दिया
पर एक बार कहा उस ने तीन बार नहीं

जहाँ तू बिछड़ा वहाँ गीत बज रहा था यही
"मिरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं"

— Varun Anand

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