भले न जल्द हो ताख़ीर से मुहब्बत हो

मगर जो हो तो किसी हीर से मुहब्बत हो

फिर उस के पाँव को भाते नहीं हैं घुँघरू भी
वो जिस के पाँव को ज़ंजीर से मुहब्बत हो

किसी कमान की नज़रें हो मेरे सीने पर
मिरे भी दिल को किसी तीर से मुहब्बत हो

वो रक़्स करते हुए मक़्तलों को बढते हैं
कि जिन को यार की शमशीर से मुहब्बत हो

ख़ुदा करे के तुझे ऐब शा'इरी का लगे
तुझे भी "मीर तक़ी मीर" से मुहब्बत हो

वो आँख सोने की दीवार देखती ही नहीं
कि जिस को आप की तस्वीर से मुहब्बत हो

— Varun Anand

More by Varun Anand

Other ghazal from the same pen

See all from Varun Anand →

Jashn Shayari Collection

Shers of jashn shayari collection.

All Jashn Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling