हम हैं बस इतने ही साहिल-आश्ना

ख़ाक-ए-मंज़िल जितनी मंज़िल-आश्ना

तुझ से छुटते ही ये आलम है कि अब
दिल की धड़कन भी नहीं दिल-आश्ना

शम्अ'' बे-परवाना जल्वा बे-नगर
क्या हुए आख़िर वो महफ़िल-आश्ना

आह ये तूफ़ाँ-ब-कफ़ अब्र-ओ-हवा
आह वो यारान-ए-साहिल-आश्ना

वक़्त वो सहरा कि जिस की गर्द में
गुम हुए जाते हैं मंज़िल-आश्ना

इस की क़ुर्बत पर न इतराओ 'अमीर'
मौज कब होती है साहिल-आश्ना

— Ummeed Fazli

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