हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं

याद आने की तरह याद वो आया भी नहीं

जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब
सर पे सूरज भी नहीं राह में साया भी नहीं

वज्ह-ए-रुस्वाई-ए-एहसास हुआ है क्या क्या
हाए वो लफ़्ज़ जो लब तक मिरे आया भी नहीं

ऐ मोहब्बत ये सितम क्या कि जुदा हूँ ख़ुद से
कोई ऐसा मिरे नज़दीक तो आया भी नहीं

या हमें ज़ुल्फ़ के साए ही में नींद आती थी
या मुयस्सर किसी दीवार का साया भी नहीं

बार-हा दिल तिरी क़ुर्बत से धड़क उट्ठा है
गो अभी वक़्त मोहब्बत में वो आया भी नहीं

आप उस शख़्स को क्या कहिए कि जिस ने 'उम्मीद'
ग़म दिया ग़म को दिल-आज़ार बनाया भी नहीं

— Ummeed Fazli

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