तुम को वेहशत तो सीखा दी गुजारें लाइक़
और कोई हुक्म कोई काम हमारे लाइक़
माजरत में तो किसी और के मसरफ में हुं
ढूंढ देता हु मगर कोई तुम्हारे लाइक़
एक दो ज़ख़्मों की गहराई और आँखों के खंडर
और कुछ ख़ास नहीं मुझ में नज़ारे लाइक़
घोंसला छाव हरा रंग समर कुछ भी नहीं
देख मुझ जैसे शजर होते है आरे लाइक़
इस इलाक़े में उजालों की जगह कोई नहीं
सिर्फ़ परचम है यहाँ चाँद सितारे लाइक़
मुझ निक्क
में को चुना उस ने तरस खा के उमेर
देखते रह गए हसरत से बेचारे लाइक़
— Umair Najmi















