खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े

सीढ़ियाँ आती रहें साँप का ख़ाना न पड़े

देख में'मार परिंदे भी रहें घर भी बने
नक़्शा ऐसा हो कोई पेड़ गिराना न पड़े

मेरे होंटों पे किसी लम्स की ख़्वाहिश है शदीद
ऐसा कुछ कर मुझे सिगरेट को जलाना न पड़े

इस तअल्लुक़ से निकलने का कोई रास्ता दे
इस पहाड़ी पे भी बारूद लगाना न पड़े

नम की तर्सील से आँखों की हरारत कम हो
सर्द-ख़ानों में कोई ख़्वाब पुराना न पड़े

रब्त की ख़ैर है बस तेरी अना बच जाए
इस तरह जा कि तुझे लौट के आना न पड़े

हिज्र ऐसा हो कि चेहरे पे नज़र आ जाए
ज़ख़्म ऐसा हो कि दिख जाए दिखाना न पड़े

— Umair Najmi

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