हर इक हज़ार में बस पाँच सात हैं हम लोग

निसाब-ए-इश्क़ पे वाजिब ज़कात हैं हम लोग

दबाओ में भी जमाअत कभी नहीं बदली
शुरूअ' दिन से मोहब्बत के साथ हैं हम लोग

जो सीखनी हो ज़बान-ए-सुकूत बिस्मिल्लाह
ख़मोशियों की मुकम्मल लुग़ात हैं हम लोग

कहानियों के वो किरदार जो लिखे न गए
ख़बर से हज़्फ़-शुदा वाक़िआ''त हैं हम लोग

ये इंतिज़ार हमें देख कर बनाया गया
ज़ुहूर-ए-हिज्र से पहले की बात हैं हम लोग

किसी को रास्ता दे दें किसी को पानी न दें
कहीं पे नील कहीं पर फ़ुरात हैं हम लोग

हमें जला के कोई शब गुज़ार सकता है
सड़क पे बिखरे हुए काग़ज़ात हैं हम लोग

— Umair Najmi

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