गर मिरे पास घर नहीं होता
लोभ में हम-सफ़र नहीं होता
चाहते चाहते गया थक मैं
प्यार उस को मगर नहीं होता
रोज़ उस को गले लगा लूँ मैं
कल्पना में डगर नहीं होता
ज़िन्दगी उस मक़ाम पर कोई
छोड़ भी दे असर नहीं होता
— Trinetra Dubey
लोभ में हम-सफ़र नहीं होता
चाहते चाहते गया थक मैं
प्यार उस को मगर नहीं होता
रोज़ उस को गले लगा लूँ मैं
कल्पना में डगर नहीं होता
ज़िन्दगी उस मक़ाम पर कोई
छोड़ भी दे असर नहीं होता
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