रस्ता काट के जो भी निकली
हर बिल्ली क्यूँ काली निकली
ऐसा वक़्त बताने को तो
घड़ी हमारी महँगी निकली
तुम तो मेरी समझ से ज़ियादा
काफ़ी ज़ियादा प्यारी निकली
नज़्म समझ के पढ़ा था तुम को
तुम भी ससुरी नस्री निकली
तुकबंदी के चमन में फ़ानी
ग़ज़ल इक उड़ती तितली निकली
— Ananth Faani















