न जदीद है न रिवायती कुछ अजीब है
किसे क्या कहूँ मेरी शा'इरी कुछ अजीब है
किसी मोड़ पर तो बताया कर कि चलें किधर
मेरे राहबर तेरी रहबरी कुछ अजीब है
तेरी ख़ामुशी में भी शोर है जो सुने कोई
बड़ी चुप सी है मेरी चीख़ भी कुछ अजीब है
कोई सुर्ख़ रौशनी रात के भी फ़लक में है
ये जो बात है तेरे शहर की कुछ अजीब है
मेरे ज़ेहन में ये शफ़क़ शफ़क़ सी है क्या बला
जो न जहल है न ही आगही कुछ अजीब है
अब 'अनन्त जी' वहाँ क्या तवक़्क़ो रखें बताएँ
कि जहाँ ग़ज़ल का रदीफ़ ही कुछ अजीब है
— Ananth Faani















