नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा
किसी से मिल के बहुत देर बा'द अच्छा लगा
तुम्हें लगा था मैं मर जाऊँगा तुम्हारे बग़ैर
बताओ फिर तुम्हें मेरा मज़ाक़ कैसा लगा
तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं
मैं आसमान चुरा लूँगा जब भी मौक़ा लगा
दिखाती है भरी अलमारियाँ बड़े दिल से
बताती है कि मोहब्बत में किस का कितना लगा
— Tehzeeb Hafi















