मुझ सेे मत पूछो कि मुझ को और क्या क्या याद है
वो मेरे नज़दीक आया था बस इतना याद है
यूँ तो दश्ते-दिल में कितनों ने क़दम रक्खे मगर
भूल जाने पर भी एक नक़्श-ए-कफ़-ए-पा याद है
उस बदन की घाटियाँ तक नक़्श हैं दिल पर मेरे
कोहसारों से समुंदर तक को दरिया याद है
मुझ से वो काफ़िर मुसलमाँ तो न हो पाया कभी
लेकिन उस को वो तरजु
में के साथ क़लमा याद है
— Tehzeeb Hafi















